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वो लाचार जिंदगी

घबरा जाता हूँ में

जब वो दिन याद आते हैं

पीड़ा के वो पल

टूट कर बिखर गया था में जब

वो रोज आँखें नम होना

वो हर हर बात पर आने वाली सिसकी

वो फूंक फूंक कर क़दमों को बढ़ाना

वो लाचार जिंदगी

 

रास्ते में पड़ा पत्थर जिसकी तकदीर का कोई पता नहीं

जाने कब कोई ठोकर मारकर आगे चल पड़े

जैसे उसका कोई वजूद ही नहीं

अपने अंजाम से बेखबर

 

वो छोटी छोटी चीज़ों का ध्यान रखना

वो बिस्तर पर पड़े रहकर रोज सोचते रहना

उन दिनों के बाद मुझे खूबसूरती कम अच्छी लगने लगी

सिक्के के दोनों पहलू नज़र आ गए थे तब

वो तड़प आज भी महसूस कर सकता हूँ

में अपनी यादों में ..

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Comment by Bhasker Agrawal on January 24, 2011 at 2:45pm
धन्यवाद गणेश जी

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 24, 2011 at 9:24am
बहुत खूब भाष्कर भाई , अच्छी रचना है , मनोभाव को बढ़िया से उकेरा है आपने | आपसे उम्मीद है कि आगे भी आपकी रचनायें तथा अन्य लेखको कि रचनाओं पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणियाँ प्राप्त होती रहेगी |

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