For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गर्म हवा है खूब यहाँ की ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

गर्म हवा है खूब यहाँ की

************************

2 2  2 2  2 2   2 2

.

जो भी मुझसे सम्बंधित है

सुख पाने से वो वंचित है

 

मौन यहाँ है सबसे अच्छा

कुछ कहना अब प्रतिबंधित है

 

मै अधिकार कहाँ से पाऊँ  

कुछ विशेष को आबंटित है

 

गर्म हवा है खूब यहाँ की

आज परिन्दा आतंकित हैं

 

अभी छाँव में धूप है शामिल

सारे सुखों मे दुख किंचित है

 

हरदम अड़चन मुझ तक आई

क्या ? कठिनाई नामांकित है

 

ये कैसी दुनिया है भाई

हर माथा सिकुड़ा, चिंतित है 

मधु भावों से आप सभी के

अब मेरा तन मन सिंचित है

 

***************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

Views: 782

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 12:12am

सादर आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 8, 2013 at 12:06am

शुक्रिया , आदरणीय सौरभ भाई जी ,  मै सुधार के लिये इसे भेज दूंगा !!!!  आपका पुनः आभार !!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 7, 2013 at 11:54pm

मैं आपकी इस ग़ज़ल को मुसलसल ग़ज़ल कभी नहीं कहूँगा, आदरणीय. हर शेर मिल कर हालाँकि एक माहौल ज़रूर बना रहे हैं लेकिन, सर, उनके अंदाज़ अलहदे ही हैं. यही तो ख़ासियत है इस ग़ज़ल के शेरों की.

इसी लिए आखिरी शेर के सानी में  पर  मुझे अतुक की तरह लगा.

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 7, 2013 at 10:17pm

आदरणीय सौरभ भाई , आपकी सराहना पाना मेरे लिये तमगे से कम नही है ,  सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!! - पर - ऊपर के शे र मे मै लगातार नकारात्मक बातें गिनवाने के बाद मै अंत मे ये कहना चाहता था कि -ये सब तो हैं मेरे साथ पर एक सुखद पहलू भी है मेरे पास वो है आप सब का मधु - भाव , अगर मै अपनी बात कह न पाया हो ऊँ तो मुझे बताइयेगा , मुझे अब  करने में कोई उज़्र नही है !!!! सादर !!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 7, 2013 at 9:12pm

वाह वाह वाह !

ग़ज़ब ग़ज़ब ग़ज़ब !!

मन मुग्ध हुआ झूम-झूम गया आदरणीय..

आखिरी शेर के सानी का पर .. इसे अब करें तो कुछ और बात बने. आप देखियेगा. या, शायद आप ही सही हों ..

सादर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 3, 2013 at 2:32pm

आदरणीय वीनस भाई , आपका गज़ल पर आना सुखद अनुभव होता है , !!!! गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!

Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:29am

जो भी मुझसे सम्बंधित है

सुख पाने से वो वंचित है

 

मौन यहाँ है सबसे अच्छा

कुछ कहना अब प्रतिबंधित है

 

ये कैसी दुनिया है भाई

हर माथा सिकुड़ा, चिंतित है 



वाह वा विशेष बधाई ... शानदार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2013 at 6:22pm

आदरणीय  एडमिन जी , इस शे र मे तकाबुले रदीफ दोष होने के कारण

शामिल छाँव में धूप अभी है  ----- इस मिसरे को -
छाँव, धूप में अभी है शामिल -  करने की कृपा करें ।  सादर !

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2013 at 6:12pm

आदरणीय अरुण अनंत भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया !!!!!! पर - के विषय मे सोच रहा हूँ भाई ,  गलत लगा तो सुधार लूंगा !!!! आपका आभार !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2013 at 5:55pm

आदरनीय नीलेश भाई , आपका बहुत बहुत शुक्रिया , तकाबुले रदीफ मेरे ध्यान मे नही  था , आपने जैसा कहा है  सुधार कर लूंगा !!!!

बह्र की छूट बताने के लिये अलग से आपका धन्यवाद !!!! सराहना के लिये आपका आभारी हूँ !!!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
yesterday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
yesterday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service