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बह्र : २१२ २१२ २१२

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इश्क जबसे वो करने लगे

रोज़ घंटों सँवरने लगे

 

गाल पे लाल बत्ती हुई

और लम्हे ठहरने लगे

 

दिल की सड़कों पे बारिश हुई

जख़्म फिर से उभरने लगे

 

प्यार आखिर हमें भी हुआ

और हम भी सुधरने लगे

 

इश्क रब है ये जाना तो हम

प्यार हर शै से करने लगे

 

कर्म अच्छे किये हैं तो क्यूँ

भूत से आप डरने लगे

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by coontee mukerji on December 29, 2013 at 7:01pm

बहुत सुंदर...गज़ल आदरणीय... हार्दिक बधाई.

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 28, 2013 at 10:29pm

अच्छी गज़ल हुई बधाई, ध्रर्मेंद्र भाई।

Comment by Shyam Narain Verma on December 28, 2013 at 5:43pm
सुन्दर ग़ज़ल हेतु बधाई....

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