सुन्दर दृश्य उत्पन्न करती हैं
एक साथ जलती ढेरों मोमबत्तियाँ
भीड़ से घिरी उनकी रोशनी
कसमसाकर दम तोड़ देती है
वातावरण में घुले नारे
खंडहर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह
कम्पन पैदा करते हैं
सर्द हवाएँ
काँटों की तरह चुभती हैं
अँधेरा गहराता जा रहा है
___
बृजेश नीरज
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
आपकी रचना पढ़कर बगुत अच्छा लगा.....
सुन्दर दृश्य उत्पन्न करती हैं
एक साथ जलती ढेरों मोमबत्तियाँ.......एक आशा
भीड़ से घिरी उनकी रोशनी
कसमसाकर दम तोड़ देती है......एक निराशा
वातावरण में घुले नारे
खंडहर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह
कम्पन पैदा करते हैं
सर्द हवाएँ
काँटों की तरह चुभती हैं......एक जिजिविषा एक संघर्ष
अँधेरा गहराता जा रहा है......एक चुभन.....आपकी रचनाएँ जाने कितने दुख दर्द लिये चलतेहै.....आशा है हमें भविष्य में आपकी और रचनाएँ पढ़ने को मिलती रहेगी. सादर
वातावरण में घुले नारे
खंडहर में पैदा हुई अनुगूँज की तरह
कम्पन पैदा करते हैं
..बहुत ही सुंदर भाव हैं आदरणीय ब्रिजेश जी ..मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें
आदरणीय नीरज भाई , मोमबत्ती जला के विरोध करने के तरीके की असलियत बताती आपकई रचना के लिये आपको बधाई ॥
बहुत सुंदर भाव, बधाई.... |
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