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क्षितिज

 

दूर छोर पर

एकाकार होते 

सिन्दूरी आसमान

और हरी धरती

 

उस रेखा का कोई रंग नहीं

 

 

एक स्थिति

 

खाली बाल्टी

और उसमें

नल से

बूँद-बूँद टपकता पानी

 

मैं देख रहा हूँ

किंकर्तव्यविमूढ़

संघर्ष

 

तपते दिनों के बाद

सर्द हवाओं का मौसम

 

कब से बारिश नहीं हुई

बहुत से सपने सूख गए

 

-  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on February 8, 2014 at 12:32pm

आदरणीय राम भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on February 8, 2014 at 12:32pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by ram shiromani pathak on February 8, 2014 at 12:30pm

एक से बढ़कर एक क्षणिकाए। …।बहुत बहुत बधाई आपकोआदरणीय भाई बृजेश जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 23, 2014 at 11:44am

आदरणीय बृजेश भाई जी 

सभी क्षणिकाएं बहुत पसंद आयीं... वैचारिक प्रस्तुतियों में आप कमाल करते हैं ...इन क्षणिकाओं के शिल्प में प्रभावोत्पादक अंतिम पंक्तियों नें मुग्ध कर दिया 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on January 20, 2014 at 6:01pm

आदरणीय अरुण भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 20, 2014 at 2:13pm

आदरणीय बृजेश भाई जी एक एक क्षणिकाएं बेहद सुन्दर बन पड़ी हैं आदरणीय सौरभ सर एवं आदरणीया कुंती जी द्वारा इस रचना पर की गई चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण है, रचना को गहराई से समझने और परखने के नए आयाम दिए हैं इस चर्चा ने. आप दोनों का हार्दिक आभार आदरणीय बृजेश भाई जी को बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना हेतु.

Comment by बृजेश नीरज on January 19, 2014 at 8:32pm

आदरणीया माहेश्वरी जी, आपका हार्दिक आभार! 

Comment by Maheshwari Kaneri on January 19, 2014 at 2:09pm

 बहुत सुन्दर क्षणिकायें है !!आदरणीय बृजेश जी  हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on January 18, 2014 at 10:15pm

आदरणीया सावित्री जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Savitri Rathore on January 18, 2014 at 8:06pm

बृजेश जी,उत्कृष्ट क्षणिकाएँ,बधाई हो !

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