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प्रीत की चली पवन,
जब मिले धरा गगन,
मेघों के गर्जन,
संगीत बन गए,
बज उठे नूपुर,
प्रेम गीत बन गए।

कान्हा की बंसी ने
प्रेम धुन बजाई
होके दीवानी देखो
राधा चली आई
अजनबी थे जो,
मन के मीत बन गए,
बज उठे नूपुर,
प्रेम गीत बन गए।

चंद्रमा के प्रेम में,
चांदनी पिघल रही,
बिन तुम्हारे नेह की,
रागिनी मचल रही,
प्रीत में यही,
जग की रीत बन गए,
बज उठे नूपुर,
प्रेम गीत बन गए।

मन का खुला साँकल है,
ऐसा ये प्यार है,
नैनो ने हामी भरी,
अधरों पे इंकार है,
हार थे जो वो,
अब जीत बन गए,
बज उठे नूपुर,
प्रेम गीत बन गए।

(अनीता मौर्या)

"मौलिक व अप्रकाशित "

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Comment

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Comment by Meena Pathak on January 13, 2014 at 12:21pm

बहुत सुन्दर गीत अनीता ... बहुत बहुत बधाई | सस्नेह 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 13, 2014 at 11:10am

आदरणीया अनिता मौर्य जी ,

बहुत ही खूबसूरत गीत गुनगुनाया आपने , हार्दिक बधाई। 

कृपया ध्यान दे...

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