वसंत
बीता कटु शीत शिशिर
मोहक वसंत आया
पुष्प खिले वृन्तो पर
मुस्काये हर डाली
मादक महक चहुँ दिशा
भरमाये मन आली
तरुण हुई धूप खिली
शीत का अंत आया
बीता कटु शीत शिशिर
मोहक वसंत आया
प्रिया की सांसों सी
मद भरा ऊषा अनिल
अंग अंग उमंग रस
जग लगे मधुर स्वप्निल
कुहूक बोले कोयल
कवि नवल छंद गाया
बीता कटु शीत शिशिर
मोहक वसंत आया ..
आम्र वृक्ष स्वर्ण मौर
महुआ रस टपकाया
देखूं दृश्य अनिमेष
किसने चित्र बनाया
अभिसार पूरित ह्रदय
जग प्रेम दिगंत छाया
बीता कटु शीत शिशिर
मोहक वसंत आया .
त्याग शर्म अवगुंठन
दे रही प्रणय निमंत्रण
वृक्ष लता लिपटाया
नगर नगर हर उपवन
हर कोने में वसुधा
के हर्ष अनंत छाया
बीता कटु शीत शिशिर
मोहक वसंत आया .
..... नीरज कुमार नीर
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
बहुत आभार आदरणीय सौरभ जी आपकी सराहना ने मन प्रफुल्लित कर दिया .
गीत विधा पर पर एक गंभीर प्रयास के लिए हृदय से बधाई नीरज नीर भाई.
आपने वासंतिक वातावरण को अपनी प्रस्तुति के माध्यम से आच्छादित करने का सुन्दर प्रयास किया है. हाँ, पंक्तियों में शब्द-संयोजन शब्दों के भार तले आ गया प्रतीत हो रहा है. वैसे ढेर सारी बधाई आपको कि इस तरह आपका कोई प्रयास पहली बार देख रहा हूँ. बहुत खूब !
शुभेच्छाएँ
आपका हार्दिक आभार आदरणीय अन्नपूर्णा जी ..
सुंदर गीत हेतु बधाई स्वीकारें , आ0 नीरज ' नीर ' जी ।
आदरणीय गिरिराज भंडारी साहब आपका हार्दिक धन्यवाद महोदय ..
आभार आदरणीया कल्पना रामानी साहिबा .. सराहना एवं प्रोत्साहन के लिए ह्रदय ताल से धन्यवाद .
आदरणीय नीरज भाई , सुन्दर बसंत गीत की रचना के लिये बधाइयाँ ॥
बसंत का सुंदर वर्णन किया है आपने आदरणीय नीरज जी, हार्दिक बधाई
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