For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Neeraj Neer's Blog (77)

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

२१२२   २१२२   १२

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

दिल्लगी दिल की लगी हो गयी

 

जिंदगी का अर्थ बस दर्द था

तुम मिले आसूदगी हो गयी

 

आ गया जो मौसमे गुल इधर

शाख सूखी थी हरी हो गयी

 

बिन तुम्हारे एक पल यूँ लगा

जैसे पूरी इक सदी हो गयी

 

जिंदगी गुलपैरहन सी हुई 

आप से जो दोस्ती हो गयी 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Neeraj Neer on July 1, 2018 at 6:32pm — 7 Comments

पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए

2122   2122     2122     212

दूरियां नजदीकियां बन तो गयी हैं आजकल

पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए

 

माँ पिता सारे मरासिम गुम  हुए इस दौर में  

रोटियों के फेर में मजबूर कितने हो गए

 

भूल जाओगे मुझे तुम एक दिन मालूम था

इश्क में मेरे मगर मशहूर कितने हो गए

 

पत्थरों पर सर पटककर फायदा कोई नहीं

उसके दर पर ख्वाब चकनाचूर कितने हो गए

 

रात काली नागिनों सी डस रही है आजकल

हमनशीं थे कल तलक मगरूर…

Continue

Added by Neeraj Neer on June 24, 2018 at 11:35am — 20 Comments

आदमी तो बनो

१२२ १ २२ १२२ १२
समंदर मिलेगा नदी तो बनो
मिलेगा खुदा आदमी तो बनो

अँधेरा मिटेगा अभी के अभी
जलो तुम जरा रौशनी तो बनो

तुम्हें भी मिलेगी ख़ुशी एक दिन
कभी तुम किसी की ख़ुशी तो बनो

करो गर मुहब्बत तो ऐसे करो
किसी की कभी जिंदगी तो बनो

जो भी चाहिए दूसरों से तुम्हें
खुदा के लिए तुम वही तो बनो

नीरज कुमार नीर 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Neeraj Neer on July 8, 2017 at 3:34pm — 5 Comments

ग़ज़ल : इस्लाह हेतू

1222  1222  1222     1222

नजर से दूर रहकर भी जो दिल के पास रहती है

कभी नींदें चुराती है कभी ख्वाबों में मिलती है. 

चमकना चाँद सा उसका मेरी हर बात पर हँसना

कहीं फूलों की नगरी में कोई वीणा सी बजती है. 

ये भोलापन हमारा है कि है जादूगरी उसकी

वफ़ा फितरत नहीं जिसकी वही दिलदार लगती है. 

कभी मैं भूल जाऊँगा उसे कह तो दिया लेकिन

जो दिल पर हाथ रक्खा तो वही धड़कन सी लगती है. 

तुम्हारा जो बचा था पास मेरे ले लिया तुमने…

Continue

Added by Neeraj Neer on May 6, 2017 at 7:55am — 19 Comments

जंगल और शहर

शहर और बस्तियाँ घुस आई हैं

जंगल के भीतर

और जंगली बंदर निकल आए हैं

जंगल से शहर में, बस्तियों में....

बंदरों को अब नहीं भाते

जंगल के खट्टे- मीठे, कच्चे-पके फल

उनके जी चढ़ गया है

चिप्स, समोसे, कचोरियों का स्वाद

आदमियों के हाथों से,

दुकानों से , घरों से छिन कर खाने लगे हैं

वे अपने पसंदीदा व्यंजन

इन्सानो को देख जंगल में छुप जाने वाले

शर्मीले बंदर

अब किटकिटाते हैं दाँत

कभी कभी गड़ा भी देते हैं

भंभोड़ लेते हैं अपने पैने दांतों से…

Continue

Added by Neeraj Neer on February 4, 2016 at 10:24pm — 14 Comments

कुएं में लोकतन्त्र

एक कुआं था

बहुत बड़ा कुआं

शीतल जल से पूर्ण

वहाँ रहते थे अनेकों मेढक

कुएं के मालिक ने कुएं में

डाल दिये कुछेक साँप

एवं फूंका मंत्र

जिससे उस कुएं में कायम हो गया लोकतन्त्र

एक मोटा मेढक बना उसका प्रधान

उसने कराया कुएं में सर्वे

और पाया कि साँपों की संख्या वहाँ है कम

मोटा मेढक और उसके चमचे हुए बहुत हैरान

उन्होने बनाया एक नियम

जिससे हो सके साँपो का उत्थान

सभी साँपो को मिले एक मेढक खाने को रोज

ऐसा हुआ प्रावधान

कहा गया बहुत…

Continue

Added by Neeraj Neer on January 20, 2016 at 8:13pm — 10 Comments

आईने की दुनिया

उसे कुछ दिखाई नहीं देता

सिवा

अपने आप के

अपनी आँखों के सामने

उसने रखा है

आईना

वह रहता है आत्ममुग्ध

समझता है स्वयं को ही

सबसे सुंदर

सर्वश्रेष्ठ

उसने देखा नहीं है

कोई और चेहरा

उसे कुछ सुनाई भी नहीं देता

बंद कर रखे हैं

उसने अपने कान

वह सुनता है

सिर्फ अपने आप को ही

गूँजती है उसके कान में

अपनी ही आवाज

मानता है अपनी बात को ही

एक मात्र सत्य

चाहता है समूची दुनियाँ को

बनाना अपने जैसा

आँखों…

Continue

Added by Neeraj Neer on December 28, 2015 at 8:34pm — 3 Comments

एक तरही गजल

2122 2122 2122 22/112



शाम लिख ले सुबह लिख ले ज़िंदगानी लिख ले

नाम अपने हुस्न के मेरी जवानी लिख ले।

कब्ल तोहमत बेवफ़ाई की लगाने से सुन

नाम मेरा है वफा की तर्जुमानी लिख ले ।

जो बनाना चाहता है खुशनुमा संसार को

अपने होंठो पे मसर्रत की कहानी लिख ले।

मंहगाई बढ़ रही है रात औ दिन चौगुनी

वादे अच्छे दिन के निकले लंतरानी लिख ले।

लाल होगी यह जमी गर इन्सानो के खूँ से

रह न जाएगा अंबर भी आसमानी लिख ले…

Continue

Added by Neeraj Neer on December 15, 2015 at 10:46pm — 16 Comments

आता है जीना जिंदगी हूँ मैं

तुम सोचते हो जो नहीं हूँ मैं
जो कुछ भी मैं हूँ वो यही हूँ मैं। 

दुश्वारियाँ करती नहीं व्याकुल
आता है जीना जिंदगी हूँ मैं। 

जो सोचना है सोचिए साहब
मैं जानता हूँ कि सही हूँ मैं। 

साहिल से यारी मैं करूँ कैसे
जाना है आगे इक नदी हूँ मैं। 

अच्छा किसे लगता भला जलना
पर क्या करूँ कि रोशनी हूँ मैं । 

नीरज कुमार नीर / मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on October 28, 2015 at 11:08pm — 12 Comments

अब आँखों से ही बरसेंगे

अंबर से मेघ नहीं बरसे

अब आँखों से ही बरसेंगे

 

शोक है

मनी नहीं खुशियाँ

गाँव में इस बार

दशहरा पर

असमय गर्भ पात हुआ है

गिरा है गर्भ

धान्य का धरा पर

कृषक के समक्ष

संकट विशाल है

पड़ा फिर से  अकाल है

खाने के एक निवाले को

रमुआ  के बच्चे तरसेंगे

 

व्यवस्था बहुत  बीमार है

अकाल सरकारी त्योहार है

कमाने का खूब है

अवसर

बटेगी राहत की रेवड़ी

खा जाएँगे  नेता,…

Continue

Added by Neeraj Neer on October 26, 2015 at 2:51pm — 11 Comments

एकात्म बोध /कविता : नीरज

तेजी से घूम रहे चक्र पर
हम ठेल दिये गए हैं
किनारों की ओर
जहां
महसूस होती है सर्वाधिक
इसकी गति
ऊंची उठती है उर्मियाँ
जैसे जैसे हम बढ़ते हैं
केंद्र की ओर
सायास
स्थिरता बढ़ती जाती है
प्रशांत हो जाती है तरंगे
सत्य का बोध
अनावृत होने लगता है
अनुभव होता है एकात्म का ....
.............. नीरज कुमार नीर

Added by Neeraj Neer on September 26, 2015 at 12:37pm — 5 Comments

हिन्दी चमक रही है / गीत

भारत के अंबर पर देखो

सूर्य सी हिन्दी चमक रही है

माँ भारती के उपत्यका में

खुशबू बनकर महक रही है

 

विभिन्न प्रांतों का सेतुबंधन

सरल सर्वजन सर्वप्रिय है

दक्षिण से उत्तर पूर्व पश्चिम

दम दम दम दम दमक रही है

 

संस्कारों की वाहक हिन्दी

सभी भाषाओं में यह गंगा

प्रगति पथ पर नित आरूढ़ ये

पग नवल सोपान धर रही है

 

यूरोप अमेरिका ने माना

है यह भाषा समर्थ सक्षम

हम भारतियों के दिल में…

Continue

Added by Neeraj Neer on September 14, 2015 at 7:59am — 6 Comments

उसकी देह अब भी मांसल है / अतुकांत कविता

सोनाली भट्टाचार्य एवं सभी तेजाब पीड़ितों के लिए 

वह एक लड़की थी

उन्नत नितंबों

पुष्ट उरोजों वाली

श्यामल घनेरे केश

बल खाते पर्वतों के बीच

लहराते

लगता बाढ़ की पगलाई नदी

मेघों के मध्य

घाटी में से गुजर रही हो

खुलकर खिलखिला कर हँसती

कई सितार एक साथ झंकृत हो उठते

उसके सपनों में आता

फिल्मी राजकुमार

जिसके साथ वह

गीत गाती झूमती नाचती

फूलों के बाग में

स्कूल कॉलेज से आती जाती

सबकी निगाहों की केंद्र बिन्दु

सबके…

Continue

Added by Neeraj Neer on September 13, 2015 at 5:17pm — 12 Comments

कोण तलाशते लोग

तुम गोलाई में तलाशते हो कोण

सीधी सरल रेखा को बदल देते हो

त्रिकोण में

हर बात में तुम तलाशते हो

अपना ही एक कोण

तुम्हें सुविधा होती है

एक कोण पकड़कर

अपनी बात कहने में

बिन कोण के तुम

भीड़ के भंवर में

उतरना नहीं चाहते

तुम्हें या तो तैरना नहीं आता

या तुम आलसी हो

स्वार्थी और सुविधा भोगी भी

तुम्हें सत्य और झूठ से भी मतलब नहीं है

इस इस देश में गढ़ डाले है

तुमने हजारो लाखों कोण

हर कोण से तुम दागते हो तीर

ह्रदय को…

Continue

Added by Neeraj Neer on August 29, 2015 at 11:14am — 12 Comments

लड़कियां और उड़हूल के फूल : नीरज कुमार नीर

लड़कियाँ होती अगर
उड़हूल के फूलों की तरह
और तोड़ ली जाती
बिन खिले
अधखिले
खिल जाती फिर भी
समय के साथ
पर लड़कियाँ तो होती हैं
गुलाब की तरह


नीरज कुमार नीर /
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on August 2, 2015 at 11:15am — 13 Comments

बस तुम नहीं आती

खोल रखे है मैंने

खिड़कियाँ और सभी दरवाजे

भीतर आते हैं

धूप , चाँदनी ,

निशांत समीर ,

दोपहर के गरम थपेड़े ,

पूस की  शीत लहर ,

बरखा बूंदे

तमस, प्रकाश

पुष्प सुवास, उमसाती गँधाती अपराह्न की हवा

और सभी कुछ

अपनी मर्जी से

और अक्सर उतर आता है

खाली आकाश भी

बस तुम नहीं आती

कितने बरस बीत गए

पर तुम नहीं आती

खोल रखे होंगे

तुमने भी शायद

खिड़कियाँ और दरवाजे

..... नीरज कुमार…

Continue

Added by Neeraj Neer on August 2, 2015 at 8:59am — 12 Comments

शहीद

बहुत सोचा तो लगा

सच ही तो कहते हैं

वे तो भर्ती होते हैं मरने के लिए

अवगत होते हैं

अपने कार्य के निहित खतरों से

पर एक बात समझ नहीं आयी

जब सामने से चलती हैं गोलियां

उनके पास भी तो होता है

भाग खड़े होने का विकल्प

पर वे भागते क्यों नहीं

देते हैं गोलियों का जवाब

पीघला देते हैं लोहे को

अपने सीने में कैद करके

बारूद को कर देते हैं बर्फ

वे धोखा नहीं दे पाते

अपनी मातृभूमि को

राजनेताओं की तरह

मेरी समझ में कुछ कमी है शायद…

Continue

Added by Neeraj Neer on July 18, 2015 at 8:18pm — 6 Comments

नदी के बीच वाला पाया (लघुकथा)

एक नदी पर एक पुल था , जिसमे सात पाये थे। एक बार सबसे बीच वाले पाए ने सबसे किनारे वाले पाए से कहा “जानते हो यह पुल मेरी वजह से ही है। नदी की जलधारा का सबसे ज्यादा प्रवाह मैं ही झेलता हूँ। मैं हमेशा पानी में डूबा रहता हूँ, तुमलोगों का क्या किनारे खड़े रहते हो, बरसात में कभी कभी नदी की जलधारा तुम तक पहुँचती है वरना सालो भर ऐसे ही खड़े रहते हो, तुम्हारी उपयोगिता ही क्या है। मेरे कारण ही लाखों लोग इस पुल का प्रयोग कर नदी के आर पार जा पाते हैं । “

किनारे वाले पाये ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ…

Continue

Added by Neeraj Neer on July 5, 2015 at 3:00pm — 12 Comments

राय बहादुर : लघु कथा

“मेरे ग्रैंड फादर राय बहादुर थे” ..... उस व्यक्ति ने बुद्धिजीवियों की सभा में अकड़ के साथ यह बात कही ।   सभा के आयोजक ने भी गर्व से अपना सर ऊंचा कर लिया । वहाँ  उपस्थित लोग जो उस व्यक्ति को मिल रहे विशेष सम्मान, तवज्जो , उसके समृद्ध पहनावे एवं उसकी मंहगी गाड़ी से पहले ही नतमस्तक हो रहे थे, यह सुनकर थोड़े  और विनीत भाव दिखलाने लगे। उसे मंच पर सबसे ऊंची कुर्सी दी गयी । सब उसके साथ एक फोटो खिचवा लेना चाहते थे । महेश सभा में सबसे पीछे की कुर्सी पर उपेक्षित सा बैठा अपने मलिन कपड़ों को देख रहा था।  वह…

Continue

Added by Neeraj Neer on June 28, 2015 at 6:25pm — 22 Comments

रात रानी

रात रानी क्यों नहीं खिलती हो तुम

भरी दुपहरी में

जब किसान बोता है

मिट्टी में स्वेद बूंद और

धरा ठहरती है उम्मीद से

जब श्रमिक बोझ उठाये

एक होता है

ईट और गारों के साथ

शहर की अंधी गलियों में

जहां हवा भी भूल जाती है रास्ता ।

तुम्हारी ताजा महक

भर सकती है उनमें उमंग

मिटा सकती है उनकी थकान

दे सकती है उत्साह के कुछ पल

कड़ी धूप का अहसास कम हो सकता है ।

पर तुम महकते हो रात में

जब किसान और श्रमिक

अंधेरे की चादर ओढ़े…

Continue

Added by Neeraj Neer on June 20, 2015 at 8:11pm — 8 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service