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Neeraj Neer
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"आ.भाई नीरज जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Jul 3
बसंत कुमार शर्मा commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"बहुत सुंदर गजल, बहुत बहुत बधाई आपको"
Jul 3
Neeraj Neer commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"आप सभी महानुभावों का आभार। जनाब समर साहब के बताये अनुसार मैं कोशिश करता हूँ।"
Jul 3
Neelam Upadhyaya commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"आदरणीय नीरज जी, बढ़िया गजल की पेशक़श के लिए मुबारकबाद ।"
Jul 2
Mohammed Arif commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"आदरणीय नीरज जी आदाब,                        बहुत अच्छी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब   की इस्लाह का संज्ञान लें ।"
Jul 2
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"वाह वाह बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..."
Jul 2
Samar kabeer commented on Neeraj Neer's blog post बूँद जो थी अब नदी हो गयी
"जनाब नीरज जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ देखें ।"
Jul 2
Neeraj Neer posted a blog post

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

२१२२   २१२२   १२बूँद जो थी अब नदी हो गयीदिल्लगी दिल की लगी हो गयी जिंदगी का अर्थ बस दर्द थातुम मिले आसूदगी हो गयी आ गया जो मौसमे गुल इधरशाख सूखी थी हरी हो गयी बिन तुम्हारे एक पल यूँ लगाजैसे पूरी इक सदी हो गयी जिंदगी गुलपैरहन सी हुई आप से जो दोस्ती हो गयी (मौलिक व अप्रकाशित)See More
Jul 2
Neeraj Neer updated their profile
Jul 1
Neeraj Neer commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल _तक़दीर आज़माने की ज़हमत न कीजिए
"वाह वाह ,,, शेर दर शेर दाद कुबूल करें  आवाज़ तो उठाइए हक़ के लिए मगरइसके लिए वतन में बग़ावत न कीजिए .....  बेहतरीन "
Jul 1
Neeraj Neer commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"हार्दिक आभार आप सभी महानुभावों का"
Jun 29
Dr Ashutosh Mishra commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"आदरणीय नीरज जी इस बढ़िया रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर"
Jun 29
Rakshita Singh commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"आदरणीय नीरज जी नमस्कार बहुत ही खूबसूरत गजल ...मुबारकबाद कुबूल फरमायें ।"
Jun 27
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"आ. भाई नीरज जी, अच्छे असआर हुये हैं हार्दिक बधाई।"
Jun 26
Neeraj Neer commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"हार्दिक आभार जनाब समर साहब  .... "
Jun 26
Samar kabeer commented on Neeraj Neer's blog post पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए
"आपने जो मिसरा लिखा है वो शिल्प और व्याकरण की दृष्टि से ठीक नहीं'चुनआव' कोई शब्द नहीं है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:- 'क़त्ल करना काम था जिनका हमेशा दोस्तो'"
Jun 26

Profile Information

Gender
Male
City State
Ranchi
Native Place
Ranchi
Profession
Govt service
About me
कविता मेरा जूनून भी है और सुकून भी .

Neeraj Neer's Blog

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

२१२२   २१२२   १२

बूँद जो थी अब नदी हो गयी

दिल्लगी दिल की लगी हो गयी

 

जिंदगी का अर्थ बस दर्द था

तुम मिले आसूदगी हो गयी

 

आ गया जो मौसमे गुल इधर

शाख सूखी थी हरी हो गयी

 

बिन तुम्हारे एक पल यूँ लगा

जैसे पूरी इक सदी हो गयी

 

जिंदगी गुलपैरहन सी हुई 

आप से जो दोस्ती हो गयी 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on July 1, 2018 at 6:32pm — 7 Comments

पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए

2122   2122     2122     212

दूरियां नजदीकियां बन तो गयी हैं आजकल

पास रहते लोग से हम दूर कितने हो गए

 

माँ पिता सारे मरासिम गुम  हुए इस दौर में  

रोटियों के फेर में मजबूर कितने हो गए

 

भूल जाओगे मुझे तुम एक दिन मालूम था

इश्क में मेरे मगर मशहूर कितने हो गए

 

पत्थरों पर सर पटककर फायदा कोई नहीं

उसके दर पर ख्वाब चकनाचूर कितने हो गए

 

रात काली नागिनों सी डस रही है आजकल

हमनशीं थे कल तलक मगरूर…

Continue

Posted on June 24, 2018 at 11:35am — 20 Comments

आदमी तो बनो

१२२ १ २२ १२२ १२
समंदर मिलेगा नदी तो बनो
मिलेगा खुदा आदमी तो बनो

अँधेरा मिटेगा अभी के अभी
जलो तुम जरा रौशनी तो बनो

तुम्हें भी मिलेगी ख़ुशी एक दिन
कभी तुम किसी की ख़ुशी तो बनो

करो गर मुहब्बत तो ऐसे करो
किसी की कभी जिंदगी तो बनो

जो भी चाहिए दूसरों से तुम्हें
खुदा के लिए तुम वही तो बनो

नीरज कुमार नीर 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Posted on July 8, 2017 at 3:34pm — 5 Comments

ग़ज़ल : इस्लाह हेतू

1222  1222  1222     1222

नजर से दूर रहकर भी जो दिल के पास रहती है

कभी नींदें चुराती है कभी ख्वाबों में मिलती है. 

चमकना चाँद सा उसका मेरी हर बात पर हँसना

कहीं फूलों की नगरी में कोई वीणा सी बजती है. 

ये भोलापन हमारा है कि है जादूगरी उसकी

वफ़ा फितरत नहीं जिसकी वही दिलदार लगती है. 

कभी मैं भूल जाऊँगा उसे कह तो दिया लेकिन

जो दिल पर हाथ रक्खा तो वही धड़कन सी लगती है. 

तुम्हारा जो बचा था पास मेरे ले लिया तुमने…

Continue

Posted on May 6, 2017 at 7:55am — 19 Comments

Comment Wall (4 comments)

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At 11:47am on February 14, 2016, Neeraj Neer said…

आपका हार्दिक आभार आदरणीय मिथिलेश जी 

At 3:17am on February 14, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 12:54pm on February 6, 2014, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय नीरज जी आपकी रचना को महीने की सर्वश्रेष्ट रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई ..सादर

At 10:45am on February 4, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय नीरज कुमार 'नीर' जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी प्रस्तुति नदी माँ है को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |


शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी

संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 

ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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