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Neeraj Kumar Neer
  • Male
  • Ranchi
  • India
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गिरिराज भंडारी commented on Neeraj Kumar Neer's blog post आदमी तो बनो
"आदरणीय नीरज भाई , बढिया गज़ल कही है , दिली मुबारक बाद पेश है . कुबूल कीजिये चौथे शेर के दोंनो मिसरों मे ' तो '  अच्छा नही लग रहा है ... इस पर विचार कर सकते हैं ।"
Jul 10, 2017
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Neeraj Kumar Neer's blog post आदमी तो बनो
"जनाब नीरज कुमार'नीर'साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । RSS"
Jul 9, 2017
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeraj Kumar Neer's blog post आदमी तो बनो
"आ. भाई नीरज जी हार्दिक बधाई ।"
Jul 9, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post आदमी तो बनो
"बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम समर कबीर साहब . "
Jul 9, 2017
Samar kabeer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post आदमी तो बनो
"जनाब नीरज कुमार'नीर'साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Jul 8, 2017
Neeraj Kumar Neer posted a blog post

आदमी तो बनो

१२२ १ २२ १२२ १२समंदर मिलेगा नदी तो बनो मिलेगा खुदा आदमी तो बनोअँधेरा मिटेगा अभी के अभी जलो तुम जरा रौशनी तो बनोतुम्हें भी मिलेगी ख़ुशी एक दिन कभी तुम किसी की ख़ुशी तो बनोकरो गर मुहब्बत तो ऐसे करो किसी की कभी जिंदगी तो बनो जो भी चाहिए दूसरों से तुम्हें खुदा के लिए तुम वही तो बनोनीरज कुमार नीर (मौलिक एवं अप्रकाशित)See More
Jul 8, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - अजब मासूम है क़ातिल हमारा ( गिरिराज भंडारी )
"बेहतरीन बेहतरीन .... "
Jul 8, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"हार्दिक आभार आ. लक्ष्मण धामी जी "
May 8, 2017
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
" बहुत खूब"
May 8, 2017
Samar kabeer and Neeraj Kumar Neer are now friends
May 8, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"आपका हार्दिक आभार आदरणीय रवि शुक्ल जी ... "
May 8, 2017
Ravi Shukla commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"आदरण्‍ीय नीरज जी बहुत सुंदर भाव आपने गजल में लिये है बधाई गजल के लिये काफिया पर जानकारी ले कर आप इसे सुधार सकते है  । बहुत बहुत बधाई इस गजल के लिये"
May 8, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post गीतिका/सतविन्द्र
"वाह बहुत सुन्दर ..."
May 7, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"शुक्रिया आ. सतविन्द्र कुमार जी .... "
May 7, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"शुक्रिया आ. बसंत कुमार शर्मा जी "
May 7, 2017
Neeraj Kumar Neer commented on Neeraj Kumar Neer's blog post ग़ज़ल : इस्लाह हेतू
"शुक्रिया आ. बसंत कुमार शर्मा जी "
May 7, 2017

Profile Information

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Male
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Ranchi
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Ranchi
Profession
Govt service
About me
कविता मेरा जूनून भी है और सुकून भी .

Neeraj Kumar Neer's Blog

आदमी तो बनो

१२२ १ २२ १२२ १२
समंदर मिलेगा नदी तो बनो
मिलेगा खुदा आदमी तो बनो

अँधेरा मिटेगा अभी के अभी
जलो तुम जरा रौशनी तो बनो

तुम्हें भी मिलेगी ख़ुशी एक दिन
कभी तुम किसी की ख़ुशी तो बनो

करो गर मुहब्बत तो ऐसे करो
किसी की कभी जिंदगी तो बनो

जो भी चाहिए दूसरों से तुम्हें
खुदा के लिए तुम वही तो बनो

नीरज कुमार नीर 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Posted on July 8, 2017 at 3:34pm — 5 Comments

ग़ज़ल : इस्लाह हेतू

1222  1222  1222     1222

नजर से दूर रहकर भी जो दिल के पास रहती है

कभी नींदें चुराती है कभी ख्वाबों में मिलती है. 

चमकना चाँद सा उसका मेरी हर बात पर हँसना

कहीं फूलों की नगरी में कोई वीणा सी बजती है. 

ये भोलापन हमारा है कि है जादूगरी उसकी

वफ़ा फितरत नहीं जिसकी वही दिलदार लगती है. 

कभी मैं भूल जाऊँगा उसे कह तो दिया लेकिन

जो दिल पर हाथ रक्खा तो वही धड़कन सी लगती है. 

तुम्हारा जो बचा था पास मेरे ले लिया तुमने…

Continue

Posted on May 6, 2017 at 7:55am — 19 Comments

जंगल और शहर

शहर और बस्तियाँ घुस आई हैं

जंगल के भीतर

और जंगली बंदर निकल आए हैं

जंगल से शहर में, बस्तियों में....

बंदरों को अब नहीं भाते

जंगल के खट्टे- मीठे, कच्चे-पके फल

उनके जी चढ़ गया है

चिप्स, समोसे, कचोरियों का स्वाद

आदमियों के हाथों से,

दुकानों से , घरों से छिन कर खाने लगे हैं

वे अपने पसंदीदा व्यंजन

इन्सानो को देख जंगल में छुप जाने वाले

शर्मीले बंदर

अब किटकिटाते हैं दाँत

कभी कभी गड़ा भी देते हैं

भंभोड़ लेते हैं अपने पैने दांतों से…

Continue

Posted on February 4, 2016 at 10:24pm — 14 Comments

कुएं में लोकतन्त्र

एक कुआं था

बहुत बड़ा कुआं

शीतल जल से पूर्ण

वहाँ रहते थे अनेकों मेढक

कुएं के मालिक ने कुएं में

डाल दिये कुछेक साँप

एवं फूंका मंत्र

जिससे उस कुएं में कायम हो गया लोकतन्त्र

एक मोटा मेढक बना उसका प्रधान

उसने कराया कुएं में सर्वे

और पाया कि साँपों की संख्या वहाँ है कम

मोटा मेढक और उसके चमचे हुए बहुत हैरान

उन्होने बनाया एक नियम

जिससे हो सके साँपो का उत्थान

सभी साँपो को मिले एक मेढक खाने को रोज

ऐसा हुआ प्रावधान

कहा गया बहुत…

Continue

Posted on January 20, 2016 at 8:13pm — 10 Comments

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At 11:47am on February 14, 2016, Neeraj Kumar Neer said…

आपका हार्दिक आभार आदरणीय मिथिलेश जी 

At 3:17am on February 14, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 12:54pm on February 6, 2014, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय नीरज जी आपकी रचना को महीने की सर्वश्रेष्ट रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई ..सादर

At 10:45am on February 4, 2014,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय नीरज कुमार 'नीर' जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी प्रस्तुति नदी माँ है को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |


शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी

संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 

ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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