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ग़ज़ल : इस्लाह हेतू

1222  1222  1222     1222
नजर से दूर रहकर भी जो दिल के पास रहती है
कभी नींदें चुराती है कभी ख्वाबों में मिलती है. 

चमकना चाँद सा उसका मेरी हर बात पर हँसना
कहीं फूलों की नगरी में कोई वीणा सी बजती है. 

ये भोलापन हमारा है कि है जादूगरी उसकी
वफ़ा फितरत नहीं जिसकी वही दिलदार लगती है. 

कभी मैं भूल जाऊँगा उसे कह तो दिया लेकिन
जो दिल पर हाथ रक्खा तो वही धड़कन सी लगती है. 

तुम्हारा जो बचा था पास मेरे ले लिया तुमने
तुम्हारी प्रीत की खुश्बू अभी भी मुझमे बसती है. 

कभी जो मुड़ के देखोगे मुझे तो जान जाओगे
कि रिश्ता टूट जाने में कहीं तेरी भी गलती है. 


नीरज कुमार नीर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 829

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Comment by Neeraj Neer on May 8, 2017 at 1:22pm

हार्दिक आभार आ. लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 8, 2017 at 11:54am

 बहुत खूब

Comment by Neeraj Neer on May 8, 2017 at 10:53am

आपका हार्दिक आभार आदरणीय रवि शुक्ल जी ... 

Comment by Ravi Shukla on May 8, 2017 at 9:20am

आदरण्‍ीय नीरज जी बहुत सुंदर भाव आपने गजल में लिये है बधाई गजल के लिये काफिया पर जानकारी ले कर आप इसे सुधार सकते है  । बहुत बहुत बधाई इस गजल के लिये

Comment by Neeraj Neer on May 7, 2017 at 12:58pm

शुक्रिया आ. सतविन्द्र कुमार जी .... 

Comment by Neeraj Neer on May 7, 2017 at 12:57pm

शुक्रिया आ. बसंत कुमार शर्मा जी 

Comment by Neeraj Neer on May 7, 2017 at 12:57pm

शुक्रिया आ. बसंत कुमार शर्मा जी 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on May 7, 2017 at 10:09am
आदरणीय नीर जी गजल में बहुत सुंदर भावों को पिरोया है,हारदिक बधाई स्वीकारें।बस काफ़िया सही नहीं बन पा रहा।यहाँ ती है रदीफ़ ही महसूस पा रहे हैं
Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 7, 2017 at 9:38am

मनोहारी ग़ज़ल दिल से दिल की बात करती हुई 

Comment by Neeraj Neer on May 6, 2017 at 10:43pm

आपका आभार आ . गिरिराज भंडारी जी .. 

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