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गजल - शशि पुरवार

जिंदगी जब से सधी होने लगी
जाने क्यूँ उनकी कमी होने लगी

डूब कर हमने जिया है काम को
काम से ही अब ख़ुशी होने लगी

हारना सीखा नहीं हमने यदा
दुश्मनो में खलबली होने लगी

नेक दिल की बात करते है चतुर
हर कहे अक से बदी होने लगी

चाँद पूनम का खिला जब यूँ लगा
यादें दिल की फिर कली होने लगी


------- शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 23, 2014 at 9:00am

वाह्ह सखी बहुत बढ़िया प्रयास  है ,मतले की प्रथम पंक्ति में कोई शब्द छूटा है शायद मापनी में पूरी पंक्ति नहीं आ रही है  

जिंदगी जब से सधी होने-----२१२२    २१२२   २ -----बधाई आपको 

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