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सह विनाश या सह विकास

सह विनाश या सह विकास  

 

दुनियाँ

परमाणु बम पर बैठी हुयी है

बस एक हिट की –

ज़रूरत है ,

मनु – युग मे जाने की

ज़रूरत नहीं होगी

तब मालूम होगा

अस्तित्व

सह विनाश का ।

पर यदि

नयी उमर की  नयी फसल -

देखनी है

तो सम्राट अशोक को

फिर से

बुद्ध के शरण मे आना होगा

गांधी और किंग की भावनाओं को

अपनाना होगा

फिर कल – कारखानों से 

सुमधुर संगीत जो निकलेगा

तब मालूम होगा

अस्तित्व

सह विकास  का ।

 

  -------  मौलिक और अप्रकाशित -------

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 14, 2014 at 9:11am

आदरणीय ब्रह्मचारी जी , आज समूचा विश्व अशांति के दौर से गुजर रहा है , ऐसे में  शांति की तलाश का  खूबसूरत सन्देश देती रचना के लिये आपको बधाइयाँ

Comment by बृजेश नीरज on April 11, 2014 at 7:26pm

बहुत अच्छी कविता! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Meena Pathak on April 10, 2014 at 4:43pm

बहुत उम्दा रचना ..बधाई आ० ब्रम्हचारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 10, 2014 at 4:24pm

आदरणीय ब्रह्मचारी जी , शांति की तलाश के अलावा शांति का कोई विकल्प नही होता !! बहुत खूबसूरत सन्देश देती रचना के लिये आपको बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 2:19pm

बहुत खूब रचना , बधाई आपको आ0 ब्रांहचारी जी । 

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