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S. C. Brahmachari's Blog (18)

सह विनाश या सह विकास

सह विनाश या सह विकास  

 

दुनियाँ

परमाणु बम पर बैठी हुयी है

बस एक हिट की –

ज़रूरत है ,

मनु – युग मे जाने की

ज़रूरत नहीं होगी

तब मालूम होगा

अस्तित्व

सह विनाश का ।

पर यदि

नयी उमर की  नयी फसल -

देखनी है

तो सम्राट अशोक को

फिर से

बुद्ध के शरण मे आना होगा

गांधी और किंग की भावनाओं को

अपनाना होगा

फिर कल – कारखानों से 

सुमधुर संगीत जो…

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Added by S. C. Brahmachari on April 8, 2014 at 9:47pm — 5 Comments

चेतनाहीन

चेतनाहीन

 

मैं

एक सपेरा हूँ , मदारी हूँ

कश्मीर से कन्या कुमारी , और –

गुजरात से अरुणाचल तक

दिल्ली

मेरी पिटारी है ।

बंद हैं इसमे काले विषधर साँप , बंदर

पर अफसोस –

ये गाँधीवादी नहीं

इनके आँख , कान और मुंह

सभी बंद हैं

क्यूँ कि ये अवसरवादी हैं ।

मैं गाँधी

एक सपेरा , मदारी !

खड़ा बजा रहा हूँ बीन

पर , अफसोस –

ये चेतनाहीन हो गए से लगते हैं ।

-------…

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Added by S. C. Brahmachari on April 4, 2014 at 9:30pm — 5 Comments

दिल तो दीवाना हुआ

दिल तो दीवाना हुआ

 

आपका इस घर मे कुछ इस तरह आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।

मुझको तो मालूम न था आप यूं छा जाएँगे

रेशमी ज़ुल्फों मे मुझको , यूं छुपा ले जाएँगे । 

आपकी ज़ुल्फों मे खोये  सुबह का आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।।

आप सावन की घटा हैं, या हैं फागुन की बहार ?

अब गले लग जाइए , मत देखिये यूं बार बार ।

नयन है मदहोश अब  तो प्यार पैमाना  हुआ

ऐसा लगता है यह घर है  आपका…

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Added by S. C. Brahmachari on April 3, 2014 at 8:30pm — 6 Comments

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

 

तुम सुंदर हो , तुम भोले हो

नटखट तुम हो बहुत सलोने ।

रूठ - रूठ जाते क्यूँ मुझसे ?

छुप छुप कर बादल के कोने ।

तुम बादल से झांक झांक कर, अपना रूप दिखाते क्यूँ हो

चाँद मुझे तरसाते क्यूँ हो ?

मुझसे स्नेह नहीं है, मानूँ –

तुम छुप जाओ नज़र न आओ ।

चंद्र बदन ढँक लो तुम अपना

मेरी बगिया नज़र न आओ ।

आँख मिचौली खेल खेल कर, रह रह मुझे रिझाते क्यूँ हो

चाँद मुझे…

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Added by S. C. Brahmachari on March 31, 2014 at 5:00pm — 8 Comments

विजय – पराजय

विजय – पराजय

 

वह जो मैंने सपने मे देखा

सोने की गाय

कुतुबमीनार पर घास चर रही थी , और –

नीचे ज़मीन पर बैठा कोई ,

सूखी रोटियाँ तोड़ रहा था ।

अचानक कुतुब झुकने लगा

मुझे ऐसा लगा, जैसे -

वह झुक कर स्थिर हो जाएगा

पीसा के मीनार की तरह

और बनेगा

संसार का आठवाँ आश्चर्य ।

पर, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ

वह धराशायी हो गया

गाय कहाँ गयी , कुतुब कहाँ गया

कह नहीं सकता

किन्तु सूखी…

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Added by S. C. Brahmachari on March 26, 2014 at 9:30pm — 9 Comments

पुजारिन

सौतेली माँ

जब मैं छोटा था

भूख से तड़पता था

लेकिन अब –

वो हर वक्त पूछती है

बेटा खाना खाओगे !

.            

पुजारिन

करबध्द खड़ी है

न जाने कब से ?

मीरा की तरह

और , कन्हैया –

किसी राधा के साथ

रास रचाने

निकल गए हैं ।

  --- मौलिक एवं अप्रकाशित ---

Added by S. C. Brahmachari on March 23, 2014 at 8:00pm — 8 Comments

आया लो फागुन का मौसम

     आया लो फागुन का मौसम

 

आया लो फागुन का मौसम, मुझको पागल हो जाने दो !

वासंती  बयार ने  तेरे -

कोमल कुंतल को बिखराए,

गजब ढा रही तेरी बिंदिया-

गालों पर फागुन छा जाये ।

तेरा बदन गुलाल हुआ , अपनी ज़ुल्फों मे खो जाने दो

आया लो फागुन का मौसम, मुझको पागल हो जाने दो !

फागुन के मौसम मे तुम पर

फूलों की  बरसात  हुयी  है,

अंग अंग फागुनी हुआ ,और –

कामदेव  की  दुआ हुयी  है।

कैसे संयम करूँ प्रिये…

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Added by S. C. Brahmachari on March 17, 2014 at 10:30pm — 4 Comments

सीमाओं मे मत बांधो

   सीमाओं मे मत बांधो

 

सीमाओं मे मत बांधो, मैं बहता गंगा जल हूँ ।  

गंगोत्री से गंगा सागर

गजल  सुनाती  आई

गंगा की लहरों से निकली –

मुक्तक  और   रुबाई ।                                

भावों मे डूबा उतराता , माटी का गीत गजल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता गंगा जल हूँ ।

यमुना की लहरों पर –

किसने प्रेम तराने गाये ?

राधा ने  कान्हा संग –

जाने कितने रास रचाए ?

होंगे महल दुमहले कितने, मैं…

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Added by S. C. Brahmachari on March 8, 2014 at 5:14pm — 15 Comments

सखि री ! फागुन के दिन आए

सखि री ! फागुन के दिन आए

 

तृषित रूपसी ठगि – ठगि जाए

कलरव  से   गूँजे   अमराई

प्रिय जाने किस  देश  पड़े ?

हर पल , हर क्षण काटे तनहाई ।

सूना – सूना  दिन लागे , साजन  की याद  सताये

सखि री ! फागुन के दिन आए ।

फूली सरसों और पगडंडी –

आज  दिखे सुनसान रे !

करवट लेते रात गुज़र गयी ,

ऐसे  हुयी  विहान  रे !

ऐसे मे कोयलिया रह – रह , हिय  की  आग बढ़ाए

सखि री ! फागुन के दिन आए…

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Added by S. C. Brahmachari on February 25, 2014 at 8:00pm — 6 Comments

मै पागल मेरा मनवा पागल

मै पागल मेरा मनवा पागल

मै पागल  मेरा मनवा  पागल, ढूँढे इंसाँ  गली - गली ।

आज फरिश्ता भी गर कोई

इस  धरती पर  आ  जाए

इंसाँ  को  इंसाँ   से  लड़ते-

देख  देख  वह  शरमाए ।

बेटी  को  बदनाम किया , जो थी नाज़ों के साथ पली

मै  पागल  मेरा मनवा पागल,  ढूँढे इंसाँ  गली - गली ।

दूध दही की नदियां थी तब-

उनमें  गंदा  पानी   बहता

द्वारे – द्वारे, नगरी – नगरी,

विषधर यहाँ  पला  करता ।

कान्हा आकर…

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Added by S. C. Brahmachari on February 22, 2014 at 10:30am — 12 Comments

मन बौराया

   मन बौराया

कंगना खनका

मन बौराया

ऐसा लगता फागुन आया ।

रूप चंपयी

पीत बसन

फैली खुशबू

ऐसा लगता

यंही कंही  है चन्दन वन ।

पागल मन

उद्वेलित करने

अरे कौन चुपके से आया ?

पनघट पर

छम छम कैसा यह !

कौन वहाँ रह – रह बल खाता ?

मृगनयनी वह परीलोक की

या है वह  –

सोलहवां सावन !

मन का संयम

टूटा जाये

देख देख यौवन गदराया ।

कंगना खनका

मन…

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Added by S. C. Brahmachari on February 21, 2014 at 6:22pm — 16 Comments

कैसा है यह जीवन मेरा !

कैसा है यह जीवन मेरा !

रोटी की खातिर मैं भटकूँ

नदियों नदियों , नाले नाले ।

अधर सूखते सूरत जल गयी

पड़े  पाँव मे  मेरे छाले ।

लक्ष्य कभी क्या मिल पाएगा , मिल पाएगा रैन बसेरा ?

कैसा है यह जीवन मेरा !                                         

 

मैंने तो सोचा था यारो

भ्रमण करूंगा उपवन-उपवन

जाने कैसे राह बदल गयी

बैठा सोचे आज व्यथित मन !

मेरा मन बनजारा बनकर ,  नित दिन अपना बदले डेरा ।

कैसा है…

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Added by S. C. Brahmachari on February 3, 2014 at 9:30pm — 12 Comments

जाने क्यूँ अलसायी धूप ?

जाने क्यूँ अलसायी धूप ?

 

माघ महीने सुबह सबेरे , जाने क्यूँ अलसायी धूप ?

कुहरा आया छाए बादल

टिप - टिप बरसा पानी ।

जाने कब मौसम बदलेगा

हार  धूप  ने   मानी ।

गौरइया भी दुबकी सोचे , जाने क्यूँ सकुचाई धूप !

माघ महीने सुबह सबेरे , जाने क्यूँ अलसायी धूप ?

बिजली चमकी , गरजा बादल

हवा   चली     पछुवाई ।

थर – थर काँपे तनवा मोरा

याद  तुम्हारी   आयी ।

घने बादलों मे घिर – घिर कर, लेती अब अंगड़ाई धूप !

माघ…

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Added by S. C. Brahmachari on February 1, 2014 at 8:40pm — 13 Comments

नियति

नियति

किसी वी आई पी के

निधन पर -

लोक सभा एवं विधान सभा ने

शोक प्रकट किया है।

शोक अक्सर प्रकट किया जाता है

कोई वी आई पी जब दिवंगत होता है।

तुम क्यूँ रोते हो ?

शायद तुम्हारे घर मे, पड़ोस मे, मुहल्ले मे –

तुम्हारा कोई अज़ीज़ दिवंगत हो गया है।

कलुआ कह रहा था

साहब, नथुवा ने

तीन दिन से खाना नहीं खाया था

बीमार था, ठंड से ठिठुर कर - दम तोड़ दिया बेचारे ने ।

उसकी घरवाली ने लाला से –

अपनी पगार मांगी थी, पर –

लाला…

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Added by S. C. Brahmachari on January 17, 2014 at 3:28pm — 4 Comments

गुरुकुल बहुत याद आता है

गुरुकुल बहुत याद आता है

.

नटखट बचपन छूटा मेरा

गुरुकुल के पावन आँगन मे ,

वो अतीत अब भी पलता है

बंजारे अंजाने मन मे ।

निधि जो गुरुकुल से ले आया, छटा नयी नित बिखराता है

गुरुकुल बहुत याद आता है !

अब भी क्या गुरुकुल प्रांगण मे

गूँजे मंत्रों की प्रतिध्वनियाँ ?

निर्मल हो पावन हो जाए

परम ब्रह्म की सारी दुनिया ।

चन्दन सी खुशबू इस जग मे, पावन गुरुकुल बरसाता है

गुरुकुल बहुत याद आता है ।…

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Added by S. C. Brahmachari on January 5, 2014 at 10:30pm — 13 Comments

नयी धूप मै ले आऊँगा !

नयी धूप मै ले आऊँगा !
नए साल मे ,
नया सवेरा -
नयी धूप मै ले आऊँगा ।
सपनों के डोले से ,
हर पल –
खुशियाँ सब पर बरसाऊंगा ।
मांगूंगा मै ,
ढेरों खुशियाँ -
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मे I
सुख, शांति की बारिश होगी
भारत के हर घर बारे मे ।
शांति प्रेम का संदेशा ले ,
मै तो अब –
घर घर जाऊंगा ।
नए साल मे ,
नया सबेरा -
नयी धूप मै ले आऊँगा ।
~~~ मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by S. C. Brahmachari on December 27, 2013 at 5:00pm — 21 Comments

यह मोरपंखी मन !

यह मोरपंखी मन !

न जाने क्यूँ प्रिये पागल –

हुआ जाता तुम्हारी याद मे यह मोरपंखी मन !

पहाड़ों पर कभी भटके

ढलानों पर कभी घूमे

कभी यह चीड़ के वन से –

घटाओं को बढ़े चूमे ।

यहाँ ठंडी हवाओं मे बढा जाता बहुत सिहरन

न जाने क्यूँ प्रिये पागल अरे यह मोरपंखी मन !

नदी , निर्झर , पहाड़ों पर

भ्रमण करता हुआ जाता

फिज़ाओं मे भटकना अब प्रिये !

पलभर नहीं भाता ।

तुम्हारे बिन हुआ जाता बड़ा सूना मेरा उपवन -

न जाने क्यूँ प्रिये ! पागल अरे यह…

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Added by S. C. Brahmachari on December 24, 2013 at 6:57pm — 20 Comments

धूप उतर आयी

धूप उतर आयी

झरोखे से झांक

आज़ सुबह मेरे कमरे मे

जब धूप उतर आयी

बढ़ गई थोड़ी सी

चंचल तरुणाई ।

यह धूप आज़ महंगी है, पर –

कल तक आवारा थी

शांति मुझे देती अब

गंगा की धारा सी ।

कैसे बताऊँ क्या है ?

जल्द फिसल जाती है

तन ठिठुर जाता

हर छाँव सिहर जाती है ।

अब तक अनदेखी है

तेरी गोराई !

ऐसे मे अनजानी

याद तेरी आयी ।

आज़ मेरे कमरे मे –

धीरे से

धूप उतर आयी

बढ़ गयी थोड़ी सी

चंचल तरुणाई ।

-…

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Added by S. C. Brahmachari on December 17, 2013 at 4:59pm — 15 Comments

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