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विजय – पराजय

 

वह जो मैंने सपने मे देखा

सोने की गाय

कुतुबमीनार पर घास चर रही थी , और –

नीचे ज़मीन पर बैठा कोई ,

सूखी रोटियाँ तोड़ रहा था ।

अचानक कुतुब झुकने लगा

मुझे ऐसा लगा, जैसे -

वह झुक कर स्थिर हो जाएगा

पीसा के मीनार की तरह

और बनेगा

संसार का आठवाँ आश्चर्य ।

पर, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ

वह धराशायी हो गया

गाय कहाँ गयी , कुतुब कहाँ गया

कह नहीं सकता

किन्तु सूखी रोटियों के टुकड़ों की

आकाश से वर्षा हो रही थी

यह मैंने साफ देखा था ।

 

----- मौलिक और अप्रकाशित -----   

           

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2014 at 4:12pm

बहुत खूब, बहुत खूब !!!

आदरणीय ब्रह्मचारीजी, अभी तक की आपकी प्रस्तुत हुई समस्त रचनाओं में यह रचना सबसे अलग, व्यवस्थित, सार्थक इंगितों से समृद्ध रचना है. इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई तथा असीम शुभकामनाएँ, आदरणीय. 

सादर

Comment by S. C. Brahmachari on April 1, 2014 at 1:33pm
प्रिय डॉ0 मुखर्जी ,
रचना पर आपकी प्रतिक्रिया पर मैं स्वयं भी आनंदित हुआ । आभार स्वीकारें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on March 31, 2014 at 2:29am
बहुत आनंद आया ब्रह्मचारी जी आपकी यह रचना पढ़कर.
Comment by S. C. Brahmachari on March 30, 2014 at 8:32pm
आ0 विजय निकोर जी,
बधाई हेतु आपका हार्दिक आभार !
Comment by S. C. Brahmachari on March 30, 2014 at 8:29pm
श्री अरुण शर्मा जी
दिल से की गयी रचना की प्रशंसा के लिए मै दिल से आभार व्यक्त करता हूँ ।
Comment by S. C. Brahmachari on March 30, 2014 at 8:25pm
आ0 राजेश कुमारी जी ,
रचना की प्रशंसा के लिए आपका हार्दिक आभार ! संभवतया त्रुटिवश आपने आ0 विजय जी को अपनी प्रतिक्रिया दी है !
Comment by vijay nikore on March 30, 2014 at 5:48am
बहुत सुन्दर कटाक्ष। बधाई।
Comment by अरुन 'अनन्त' on March 28, 2014 at 11:26am

वाह बहुत ही प्रभावशाली सशक्त रचना, दो भिन्न परिस्थितिओं को कम शब्दों में बहुत ही सटीक ढंग से प्रस्तुत किया है आपने. आपको दिल से बधाइयाँ प्रेषित करता हूँ स्वीकार करें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 28, 2014 at 10:32am

अद्दभुत कल्पना और उसके पीछे जबरदस्त कटाक्ष .....सूखी रोटियाँ ही तो बची हैं इस देश में ...न सोने की गाय रही न सोन चिरैया 

रचना में देश की भावी  सूरत परिलक्षित होती है ...बहुत खूब ...आ० विजय जी,बधाई आपको.   

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