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ग़ज़ल - कोयला दहके तो अच्छा है ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122     2

अब हवा है , कोयला दहके तो अच्छा है        

देख ले ये बात भी कहके तो अच्छा है

 

खूब झेला पतझड़ों को, अब कोई कोना

इस चमन का भी ज़रा महके तो अच्छा है

 

सीलती सी, उस अँधेरी झोपड़ी में भी ,

देखते हैं आप जो रहके , तो अच्छा है

 

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है

 

ज़िन्दगी बेस्वाद लगती है लकीरों में

अब क़दम थोड़ा अगर, बहके तो अच्छा है

 

इन सजावट के सभी हर्फों को झूठा मान  

झाँक नीचे, ऊपरी तह के तो अच्छा है  

*************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित  ( संशोधित )

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2014 at 4:59pm

आदरणीय आशुतोष भाई , गज़ल की सराहना और उत्साह् वर्धन के लिये आपका आभार ॥

Comment by Maheshwari Kaneri on May 17, 2014 at 4:03pm

  बहुत सुन्दर.. लाजवाब गजल .. आदरणीय गिरिराज जी, हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by Vindu Babu on May 17, 2014 at 2:40pm

 कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है...क्या बात है आदरणीय भंडारी जी।

बहुत बधाई आपको इस सुंदर गज़ल के लिए।

सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 17, 2014 at 2:16pm

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है

इस सजावट के सभी हर्फों को झूठा मान  

झाँक नीचे, ऊपरी तह के तो अच्छा है  ...आदरणीय गिरिराज भाईसाब .बेहतरीन शेरो के ग़ज़लरूपे गुलदस्ते के इन दो शेरो के लिए बिशेष रूप से बधाई के साथ सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2014 at 1:06pm

आदरणीया कुंती जी , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2014 at 1:05pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 17, 2014 at 1:05pm

आदरनीय लक्ष्मण धामी भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by coontee mukerji on May 17, 2014 at 12:05am

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है......बहुत सुंदर..और अच्छी गज़ल के लिये हार्दिक  बधाई.गिरिराज जी...सादर

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 16, 2014 at 11:21pm

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है........कितनी गहन बात

इस सजावट के सभी हर्फों को झूठा मान  

झाँक नीचे, ऊपरी तह के तो अच्छा है........... यथार्थ  :-))

बहुत लाजवाब गजल हुई आदरणीय गिरिराज जी, हार्दिक बधाई स्वीकारें

 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 16, 2014 at 11:56am

खूब झेला पतझड़ों को, अब कोई कोना

इस चमन का भी ज़रा महके तो अच्छा है .... बहुत खूब

 

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है..... क्या महीन बात कही आदरणीय भाई गिरिराज जी , कोटि कोटि हार्दिक बधाई

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