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आदमी हूँ सनम कोई तोता नहीं

सोचते ही रहे खेत जोता नहीं
प्‍यार के फूल क्‍यों कोई बोता नहीं


लुट गई देख अबला कि अस्‍मत यहाँ
शर्म से कोई आँखे भिगोता नहीं

तोड़ कर कोई जाता न दिल प्‍यार में
साथ अपनो का अब कोई खोता नहीं

सोच हैरान क्‍यों रोज इज्‍जत लुटे
चैन की नी़ंद क्‍यो़ं कोई सोता नहीं

क्‍या भरोसा करें हम किसी का सनम
आदमी आदमी का ही होता नहीं

बात में बात सबकी मिलाता रहूँ
आदमी हूँ सनम कोई तोता नहीं

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by Akhand Gahmari on June 11, 2014 at 7:29pm

हम आपके उत्‍सावर्धन एवं मार्गदर्शन के सदैव आकांक्षी है, आपको प्रणाम आदरणीय नरेन्‍द्र सिह चौहान जी 

Comment by Akhand Gahmari on June 11, 2014 at 7:28pm

हम आपके उत्‍सावर्धन एवं मार्गदर्शन के सदैव आकांक्षी है, रचना आपको पसंद आयी आपने रचना पर अपनी प्रतिक्रिया स्‍वरूप आशीवाद दिया आपको प्रणाम आदरणीया डा0 प्राची सिंह जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 10, 2014 at 10:40pm

बढ़िया अश'आर हुए हैं 

बहुत बहुत बधाई आ० अखंड गहमरी जी 

कृपया ध्यान दे...

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