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दोहा सलिला: देख दुर्दशा देश की संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला: 

 

देख दुर्दशा देश की

 

संजीव 'सलिल'
*
देख दुर्दशा देश की, चले गये जो दूर.
उनसे केवल यह कहूँ, आँखें रहते सूर..

देश छोड़ वे भी गये, जिन्हें प्रगति की चाह.
वाह मिली उनको बहुत, फिर भी भरते आह..

वसुधा जिन्हें कुटुंब है, दुनिया जिनका नीड़.
वे ही मानव रत्न हैं, बाकी केवल भीड़..

बसे देश में जो 'सलिल', चाह रहे बदलाव.
सच्चे मानव हैं वही, जो तजते अलगाव..

सिर्फ देश को कोसते, करते नहीं सुधार.
उन कापुरुषों की करें, चर्चा क्यों बेकार?

जो कमियों को खोजकर, चाहें कर लें दूर.
ऐसों का संग दीजिये, कहीं रहें भरपूर..

नहीं यहाँ सब कुछ बुरा, नहीं वहाँ सब श्रेष्ठ.
श्रेष्ठ यहाँ भी है बहुत, बहुत वहाँ है नेष्ट..

धूप-छाँव, सुख-दुःख सदृश, भले-बुरे का मेल.
है दुनिया में सब जगह, हार-जीत का खेल..

दर्शन मत कर दूर से, तनिक निकट आ मीत.
माटी को चंदन समझ, तभी बढ़ेगी प्रीत..

गर्व न करना दृष्टि पर, देखे आधा सत्य.
जिसे न देखे कह रही, उसको व्यर्थ असत्य..

देश गर्त में देखकर मिलती जिसको शांति.
वह केवल दिग्भ्रमित है, मन में पले भ्रान्ति..

जैसा भी है देश यह, है मेरा भगवान.
इसकी खातिर जी-मरूँ, शेष यही अरमान..

त्रुटियों की चर्चा करूँ, लेकर मन में आस.
बेहतर से बेहतर बने, देश- यही अहसास..

******************

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on February 27, 2011 at 7:53am

bgee ji!

 

gungrhakata ko naman.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 26, 2011 at 12:30pm

देश छोड़ वे भी गये, जिन्हें प्रगति की चाह.
वाह मिली उनको बहुत, फिर भी भरते आह..... भारतीय जो अपनी मिटटी से दूर है उनके दर्द को बयान करता दोहा ,

 

जो कमियों को खोजकर, चाहें कर लें दूर.
ऐसों का संग दीजिये, कहीं रहें भरपूर.... शिक्षापरक दोहा ,

 

त्रुटियों की चर्चा करूँ, लेकर मन में आस.
बेहतर से बेहतर बने, देश- यही अहसास..  हर भारतीय के मन की बात

 

सभी दोहें एक से बढ़कर एक , बधाई आचार्य जी , इस सुंदर छंद के लिये |

Comment by sanjiv verma 'salil' on February 24, 2011 at 8:32pm
dhanyavad.

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