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आज मन के भाव को,
प्रेम का शुभ संचार दो।
आज हृदय की पीर को,
आत्मा में विस्तार दो।।

मैं तुम्हारे गीत गाती
ही रहूँगी जन्म भर।
तुम्हारे प्रेम-दीवानी हो,
ये कहूँगी मृत्यु तक।।   

मुझे विरह में लीन रखो,
तुम चाहे तो आजीवन।
दो न अपने दर्शन मुझे,
तुम चाहे तो आमरण।।

सुनो,मैं तुम्हारी प्रेयसी,
औ मैं ही तुम्हारी प्रेरणा।
चैन कब आएगा तुमको,
इस जन्म में मेरे बिना।।
'सावित्री राठौर'
[मौलिक एवं अप्रकाशित]

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Comment by Savitri Rathore on June 29, 2014 at 8:50pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी और लक्ष्मण जी आप दोनों का अमूल्य प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 27, 2014 at 11:18am

आ0 सावित्री जी इस भावविभोर करने वाली सुंदर प्रेममय रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें l

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 26, 2014 at 11:45pm

मुझे विरह में लीन रखो,
तुम चाहे तो आजीवन।
दो न अपने दर्शन मुझे,
तुम चाहे तो आमरण............बहुत सुंदर, मन को छू जाते भाव. बधाई स्वीकारें आदरणीया सावित्री जी

Comment by Savitri Rathore on June 26, 2014 at 7:37pm

आदरणीया आशा जी, अन्नपूर्णा जी और कनेरी जी,सादर नमस्कार ! आप सभी के उत्साहवर्धन हेतु मैं आभारी हूँ। स्नेह बनाये रखियेगा। 

Comment by Maheshwari Kaneri on June 25, 2014 at 5:58pm

आज मन के भाव को,
प्रेम का शुभ संचार दो। 
आज हृदबहुत सुंदर रचना , 
आत्मा में विस्तार दो।। .....बहुत सुंदर रचना , बधाई आपको आ0 सावित्री जी । 

Comment by annapurna bajpai on June 25, 2014 at 5:31pm

बहुत सुंदर रचना , बधाई आपको आ0 सावित्री जी । 

Comment by asha pandey ojha on June 25, 2014 at 4:08pm

bahut sundar prarthna 

Comment by Savitri Rathore on June 25, 2014 at 12:18pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी,आप वरिष्ठजनों का स्नेह ऐसे ही बना रहे और मेरा पथ-प्रदर्शन करता रहे। आभार !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 25, 2014 at 12:10pm

सावित्री जी

आपके मनोभाव मधुर है  i सुन्दर है i ऐसे ही भाव सरसाते  जाiइये i

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