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भीषण गरमी का मौसम( अतुकांत)

भीषण गरमी के मौसम में

हम करते हैं आराम।

लेकिन जिन्दगी में,

कैसे करें आराम ।

काली काली जामुन

सावन से पहले की मीठी मीठी

हमने खायी,नहाते नहाते

क्या बिन बिजली हम जीते नहीं थे

अब सब बिजली के बिन चिल्लाते हैं

मजदूरों को कभी गरमी नहीं लगती

न वो बोलते हैं

अगर बोलें भी , तो कोई नहीं सुनता।।

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:24pm

बृजेश जी, धन्यवाद

Comment by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:23pm

जवाहर जी, बिल्कुल, मजदूरों से मजदूरी करवा कर भी लोग मजदूरी देते वक्त हाथ भींचते हैं।

Comment by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:22pm

Comment by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:21pm
ganesh ji,आपका बहुत बहुत शुक्रिया। यह कविता बच्चों के वाक्यों पर लिखी गई वैसे ही जैसे उन्होंने बोली
Comment by बृजेश नीरज on June 30, 2014 at 11:38pm
अच्छा प्रयास। आपको बधाई।
हर रचना लिखे जाने के बाद भी कुछ समय चाहती है।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 29, 2014 at 9:50pm

क्या बिन बिजली हम जीते नहीं थे

अब सब बिजली के बिन चिल्लाते हैं

मजदूरों को कभी गरमी नहीं लगती

न वो बोलते हैं

अगर बोलें भी , तो कोई नहीं सुनता।।

इन पर कौन ध्यान देगा? बिजली के टावर पर चढ़कर काम करनेवालों मजदूरों के घरों में भी बिज्ली नहीं होती 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 29, 2014 at 8:18pm

//भीषण गरमी के मौसम में

हम करते हैं आराम।

लेकिन जिन्दगी में,

कैसे करें आराम ।//   हम करते हैं आराम, जिंदगी में कैसे करे आराम, यह उलझा रहा है आदरणीय, बात स्पष्ट नहीं हुई। अंतिम स्टेन्जा प्रभावित करता है,  अतुकांत पर बढ़िया प्रयास है, बधाई। 

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