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निराशा की ऊँची लहरों

और आशा के सपाट प्रवाह के बीच

मन हिचकोले खा रहा है

कभी निराशा अपने पाश में बाँध कर खींच ले जाये

कभी आशाएँ

मुझे ले जाकर किनारे पहुँचा दें

कभी सोचता हूँ

बह चलूँ लहरों के साथ

कभी लगे

बाहर आ जाऊँ इस गर्दिश से

 

ये किस मुकाम पर हूँ

ये कौन सा मोड़ है

पल-पल उठती रौशनी भी

भ्रमित कर दे कुछ देर को

कि रास्ता बदल लूँ

या चलता रहूँ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:16pm

आदरणीय सौरभ सर आपका तहेदिल शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:15pm

आदरणीया मीनाजी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:15pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:14pm

आदरणीय करुण सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:10pm

आदरणीया कल्पना जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:09pm

आदरणीय वेदिका जी ज़र्रानवाज़ी के लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:09pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 22, 2014 at 11:08pm

आदरणीया राजेश दीदी आपका हार्दिक आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 22, 2014 at 12:46am

रोज़ाना की कश्मकश और ज़िन्दग़ी की जद्दोजहद को निहायत जिम्मेदारी से आपने बाँधने की कोशिश की है.

अतुकान्त पर हो रहा प्रयास सार्थक है. हार्दिक बधाइयाँ और अनेकानेक शुभकामनाएँ ..

Comment by Meena Pathak on July 20, 2014 at 6:16pm

ये किस मुकाम पर हूँ

ये कौन सा मोड़ है

पल-पल उठती रौशनी भी

भ्रमित कर दे कुछ देर को

कि रास्ता बदल लूँ 
या चलता रहू ..................आशा और निराशा के बीच  ये मन ......सुन्दर  रचना , बधाई आदरणीय शिज्जू जी 

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