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मरा था मैं तड़प कर वो जमाना भी भुला देना
बसाया था तुझे दिल में फसाना भी भुला देना

जले खुद थे चरागो से बचाया था तुझे हमने
नहीं ये राह फूलो की बताना भी भुला देना

सहे है दर्द हम कितने पता हो तो जरा बोलो
छुपा कर दर्द मेरा  मुस्‍कुराना भी भुला देना

निगााहो में बसाया था तुझे आखे बनाया था
चली जो छोड़ कर अाँसू बहाना भी भुला देना


उड़े आंचल तुम्‍हारे थे सभाला था हवाओं से
कहा था कुछ हवाओं ने बताना भी भुला देना

मौलिक एवं अप्रकाशित

अखंड गहमरी गहमर गाजीपुर

Views: 794

Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 21, 2014 at 9:55pm

बहुत खूबसूरत गजल , आदरणीय अखंड जी. दिली बधाइयाँ आपको

Comment by कल्पना रामानी on July 21, 2014 at 9:29pm

बहुत अच्छी गजल कही है आदरणीय अखंड जी, मन से बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Santlal Karun on July 21, 2014 at 9:25pm

आदरणीय अखंड गहमरी जी,

ग़ज़ल बहुत अच्छी तरह कही गई है --

"उड़े आंचल तुम्‍हारे थे सँभाला था हवाओं से
कहा था कुछ हवाओं ने बताना भी भुला देना'

...हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

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