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ग़ज़ल :- और कुछ इत्मीनान है बाकी

ग़ज़ल :- और कुछ इत्मीनान है बाकी

और कुछ इत्मीनान है बाकी ,

रास्तों में ढलान है बाकी |

 

कील कांटे सलीब बिकने लगे ,

कौन ईसा महान है बाकी |

 

परकटा देख परिंदा बोला ,

हौसले की उड़ान है बाकी |

 

एक मुद्दत से निशाने पर हूँ ,

तीर चढ़ना कमान है बाकी |

 

देख ली आज भारतीय संसद ,

और कोई दुकान है बाकी |

 

घर तो कबके गये हैं टूट सभी ,

सबका अपना मकान है बाकी |

 

गोली नाथू चला रहा अब तक ,

तो भी गाँधी में जान है बाकी |

 

गांव में चिमनियां उग आई हैं ,

मुश्किलों में सीवान है बाकी |

 

है ज़हर में बुझा हरेक दाना ,

खेत में क्यों मचान है बाकी |

 

(अभिनव अरुण दि.-२७-०२-२०११ )

 

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on March 2, 2011 at 2:01pm

बागी जी आपके शब्द मेरे लिये लेखन की उर्जा और हौसले के सामान है ,आभार आपका आपने गज़ल पसंद की ! अभी भी मेरा प्रयास अपनी रचना को सबसे पहले ओ.बी.ओ. पर देना होता है और सदा रहेगा यहाँ जो रेस्पोंस और संतोष है उसमे कृत्रिमता नहीं और चुनिन्दा लोग हैं जो लेखन से जुड़े और उसे समझते हैं | यही बात इस साईट को औरों से अलग और विशिष्ट बनाती है | यह खूब प्रगति करे यही कामना है |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 28, 2011 at 7:40pm
अरुण भाई , आपके पास ख्यालात गज़ब के है , सभी शे'र एक पर एक है ,

गोली नाथू चला रहा अब तक ,
तो भी गाँधी में जान है बाकी |

अरुण भाई ग़ज़ल की जान है यह शे'र , मुझे पूरा विश्वास है की यह शे'र आपके भी दिल के नजदीक होगा |

बधाई स्वीकार करे इस बेहतरीन प्रस्तुति पर |
Comment by Abhinav Arun on February 28, 2011 at 2:19pm
शुक्रिया अश्वनी जी आपने ग़ज़ल पसंद की |
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 27, 2011 at 11:02pm
badhiya ghazal kahi hai...............badhai

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