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कविता :- छोड़ दूं सच साथ तेरा

कविता :-  छोड़ दूं सच साथ तेरा

हर अनुभव हर चोट के बाद

अक्सर ऐसा सोचता हूँ

छोड़ दूं सच साथ तेरा

चल पडूँ ज़माने की राह

जो चिकनी है और दूर  तक जाती है

जिस राह पर चलकर

किसी को शायद नहीं रहेगी

शिकायत मुझसे

अच्छा रहूँगा

सबकी नज़र में

हाँ में हाँ मिलाने वाला

गलतियों से मुंह चुराने वाला

पर ये हो नहीं पाता

और मैं हर बार

बना लेता हूँ एक नया दुश्मन !

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on March 2, 2011 at 2:08pm
अश्वनी जी और वीरेंद्र जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ... रचना आपको पसंद आयी लिखना सार्थक हुआ |पुनः आभार टिप्पणी हेतु |
Comment by Veerendra Jain on March 1, 2011 at 7:32pm

Arun ji...bahut hi saargarbhit rachna likhi hai aapne..... sach ki raah men rore atkaane wale bhi kam nahi hote jo hamaare dushman bhi ban jate hain , kintu is raah ko chhoda bhi jaye to kaise ???

bahut bahut badhai is behatarin kavita ke liye...

Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 1, 2011 at 12:14am
ACHHI RACHANA KE LIYE BADHAI
Comment by Abhinav Arun on February 28, 2011 at 2:20pm

आभारी हूँ नीलम जी आपने कविता पसंद की |

Comment by Neelam Upadhyaya on February 28, 2011 at 9:55am

 Samaj ki yahi wastavikata hai. Sach bolne ka matlab ek aur dushman khada karna hita hai. Bahut hi badhiya.

 

Comment by Abhinav Arun on February 27, 2011 at 7:34pm
काव्य पर टिप्प्पणी व प्रयास की सराहना हेतु आभारी  हूँ आदरणीया रश्मि जी ! शुक्रिया !!!
Comment by rashmi prabha on February 27, 2011 at 7:26pm
हाँ में हाँ मिलाकर अपनी निगाह से तो नहीं गिरते ... बहुत अच्छी रचना
Comment by Abhinav Arun on February 27, 2011 at 6:41pm
आदरणीय श्री बागी जी ,तिलक राज जी ,अखिलेश्वर जी और आदरणीया वंदना जी रचना पसंद कर हौसला बढाने के लिये आभार !
Comment by Akhileshwar Pandey on February 27, 2011 at 4:41pm

बेहतरीन कविता के लिए बधाई अरुण भाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on February 27, 2011 at 12:42pm

साथ सच का जब दिया तो मित्र कुछ कम हो गये

सच कभी बदला नहीं पर दोस्‍त मौसम हो गये।

 

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