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सारी उमर मैं बोझ उठाता रहा जिनका
उन आल-औलादों की वफ़ा गौर कीजिये
मरने के बाद मेरा बोझ ले के यूँ चले
मानो निजात पा गए हों सारे बोझ से

मैंने समझ के फूल जिनके बोझ को सहा
छाती से लगाया जिन्हें अपना ही जानकर
वे ही बारात ले के बड़ी धूम धाम से
बाजे के साथ मेरा बोझ फेंकने चले

अपने लिए ही बोझ था मै खुद हयात में
अल्लाह ये तेरा भला कैसा मजाक है
ज्योही जरा हल्का हुआ मै मरकर बेखबर
खातिर मै दूसरों के एक बोझ बन गया

लगती थी बोझ जिन्दगी उनके बिना मुझे
यह चाह थी मरकर कभी उनसे गले मिलूँ
मरकर भी बेवफा को जब मै न पा सका
लिल्लाह मेरी मौत मेरा बोझ बन गयी
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 1, 2014 at 5:25pm

करुण जी

रचना पर समय देने के लिए मै ह्रदय से आभारी हूँ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 1, 2014 at 5:25pm

मित्र

आपका स्नेह ह्रदय से स्वीकार I

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 1, 2014 at 5:24pm

आशुतोष जी

आपका शत-शत आभार i

Comment by Santlal Karun on September 1, 2014 at 5:13pm

आदरणीय डॉ. श्रीवास्तव जी, 

वृद्धावस्था की बोझिल विसंगति पर हृदयवेधी भावनाएँ इस रचना में आई हैं --

"मरने के बाद मेरा बोझ ले के यूँ चले
मानो निजात पा गए हों सारे बोझ से

मैंने समझ के फूल जिनके बोझ को सहा 
छाती से लगाया जिन्हें अपना ही जानकर 
वे ही बारात ले के बड़ी धूम धाम से 
बाजे के साथ मेरा बोझ फेंकने चले"

...हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 1, 2014 at 4:51pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , लाजवाब रचना की है आपने , बस वाह वह | जीवन की तल्ख सच्चाई को नंगा कर दिया है | तहे दिल से बधाई स्वीकार करें | और निम्न पंक्तियों के लिए अलग से बधाई --

मरकर भी बेवफा को जब मै न पा सका
लिल्लाह मेरी मौत मेरा बोझ बन गयी -  वाह |

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 31, 2014 at 9:50pm

आदरणीय गोपाल सर ..इस रचना के माध्यम से जिन्दगी की कटु यथार्थ से आपने रूबरू कराया है ..इस बेहतरीन रचना के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 31, 2014 at 1:13pm

जीतू जी

आपका हार्दिक आभार i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 31, 2014 at 12:06pm

एक कोरा और कटु सत्य कहती हुई रचना. एक अंतिम सत्य. आदरणीय डा. गोपाल जी इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 30, 2014 at 5:02pm

नरेन्द्र जी

आपका आभारी हूँ i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 30, 2014 at 5:02pm

विजय सर

आपका  प्रोत्साहन मेरी उर्जा बने i सादर i

कृपया ध्यान दे...

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