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खाली घर बेसामान रहा हूँ।।

खाली घर बेसामान रहा हूँ।
अपने ही घर दरबान रहा हूँ।।

बदनामी का आलम है ऐसा।
यूँ खुद पे ही अहसान रहा हूँ।।

कभी कभी हँस लेता हूँ यारों।
आखिर मै भी इंसान रहा हूँ।।

अक्सर दिल से खेला करती है।
मै तो केवल सामान रहा हूँ।।

लगता है तुम तो भूल गये हो।
लेकिन मै तो पहचान रहा हूँ।।

वो जो अब मुझको छोड़ गये है।
उनका ही मै अरमान रहा हूँ।।

वो जाने किस शै में दिख जाये।।
अब सारी दुनियाँ छान रहा हूँ।।
**************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Views: 526

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Comment by ram shiromani pathak on September 7, 2014 at 9:57pm
हर्दिक आभार आदरणीय हरिबल्लभ जी।।।। सादर
Comment by harivallabh sharma on September 7, 2014 at 9:35pm

अति सुन्दर...कभी कभी हँस लेता हूँ यारों।

आखिर मै भी इंसान रहा हूँ।।...सुन्दर शेर....

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