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Ram shiromani pathak's Blog (143)

ग़ज़ल(212)

उम्रभर।
मोतबर।।

मुश्किलें।
तू न डर।।

ताकती।
इक नज़र।।

धूप में।
है शज़र।।

वो तेरा।
फिक्र कर।।

रात थी।
अब सहर।।

इश्क़ ही।
शै अमर।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

Added by ram shiromani pathak on June 19, 2018 at 8:29am — 10 Comments

ग़ज़ल(2122 1212 22)

जो तेरे आस पास बिखरे हैं।।

वो मेरे दिल के सूखे पत्ते हैं।।

काग़ज़ी फूल थे मगर जानम।।

तेरे आने से महके महके हैं।।

याद आती है उनकी जब यारों।

मुझमे मुझसे ही बात करते हैं।।

बदली किस्मत ज़रा सी क्या उनकी।।

वो ज़मीं से हवा में उड़ते है।।

जिनके ईमान ओ अना हैं गिरवी।।

वो भी इज़्ज़त की बात करते है।।

'राम' बच के रहा करो इनसे।

ये जो कातिल हसीन चेहरे है।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि…

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Added by ram shiromani pathak on May 29, 2018 at 11:48am — 8 Comments

ग़ज़ल 212×4

ख्वाब थे जो वही हूबहू हो गए।
जुस्तजू जिसकी थी रूबरू हो गए।।

इश्क करने की उनको मिली है सज़ा।
देखो बदनाम वो चार सू हो गए।।

फ़ायदा यूँ भटकने का हमको हुआ।।
खुद से ही आज हम रूबरू हो गए।।

बेचते रात दिन जो अना को सदा।
वो ज़माने की अब आबरू हो गए।।

आप कहते न थकती थी जिनकी ज़ुबां।
आज उनके लिए हम तो तू हो गए।।

मौलिक /अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

Added by ram shiromani pathak on May 23, 2018 at 12:21pm — No Comments

ग़ज़ल(2122 1212 22)

मुंतजिर हूँ मैं इक जमाने से।
आ जा मिलने किसी बहाने से।।

उनकी गलियों से जब भी गुजरा हूँ।
ज़ख़्म उभरे हैं कुछ पुराने से।।

दिल की बातें ज़ुबां पे आने दो।
कह दो! मिलता है क्या छुपाने से।।

मेरे घर भी कभी तो आया कर।
ज़िन्दा हो जाता तेरे आने से।।

इश्क़ की आग राम है ऐसी।
ये तो बुझती नहीं बुझाने से।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

Added by ram shiromani pathak on May 21, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

दोहे(विविधा)

मुझे देख उनको लगा,हुआ मुझे उन्माद।।

नयनों से वाचन किया,अधरों से अनुवाद।।1

अभी पुराने खत पढ़े,वही सवाल जवाब।

देख देख हँसता रहा,सूखा हुआ गुलाब।।2

मन को दुर्बल क्यों करें,क्षणिक दीन अवसाद।

आगे देखो है खड़ा,आशा का आह्लाद।।3

विविध रंग से हो भरा,भावों के अनुरूप।।

स्नेह इसी अनुपात में ,मैं प्यासा तुम कूप।।4

करुणा प्यार दुलार औ,इक प्यारी सी थाप।

माँ ही पूजा साथ में,है मन्त्रों का जाप।।5

स्वाभिमान को…

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Added by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 3:01pm — 2 Comments

ग़ज़ल(2122 1212 22)

उसकी खातिर करो दुआ प्यारे।।

इस तरह से निभा वफ़ा प्यारे।।

जो हो शर्मिंदा अपनी गलती पे।

उसको हर्गिज न दो सजा प्यारे।।

माना पहुँचे हो अब बुलंदी पर।

तुम न खुद को कहो खुदा प्यारे।।

कत्ल करके वो मुस्कुराता है।

कितनी क़ातिल है ये अदा प्यारे।।

जिनको रोटी की बस जरूरत है।

उनपे बेकार सब दवा प्यारे।।

'राम' बुझने को हैं उन्हें छोड़ो।

दें चरागों को क्यूँ हवा प्यारे।।

मौलिक अप्रकाशित

राम…

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Added by ram shiromani pathak on May 13, 2018 at 11:15am — 8 Comments

ग़ज़ल(122 122 122 122)

कभी इसके दर पे कभी उसके दर पे।

सियासत की पगड़ी पहनते ही सर पे।।

वही कुछ किताबें वही बिखरे पन्नें।

मिलेगा यही सब अदीबों के घर पे।।

लगे गुनगुनाने बहुत सारे भौरें।

नया फूल कोई खिला है शज़र पे।।

मुझे प्यार से यूँ ही नफरत नहीं है।।

बहुत ज़ख़्म खाएं है जिस्मों जिगर पे।

बहुत कुछ है अच्छा बहुत कुछ हसीं है।

लगाओ न नफरत का चश्मा नज़र पे।।

जिधर देखो लाशें ही लाशें बिछी है।

मुसीबत है आयी ये कैसी नगर…

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Added by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

मुझको गले लगाती है(ग़ज़ल)

 मुझको गले लगाती है।

 तब जाकर फुसलाती है।।

 कितने मरते होंगे जब।

 होठ चबा मुस्काती है।।

 चूम चूमकर आँखों से।

 मेरा दर्द बढ़ाती है।।

 जलन चाँद को होती है।

 वो छत पे जब आती है।।

 छिपकर देखा करती है।

 मैं देखूँ छिप जाती है।।

 2222222

मौलिक अप्रकाशित

 राम शिरोमणि पाठक

Added by ram shiromani pathak on May 8, 2018 at 10:02pm — 9 Comments

ग़ज़ल

मारे घूसे जूते चप्पल बदज़ुबानी सो अलग।

और कहते गाँव को मेरी कहानी सो अलग।।

आये साहब वादों की गोली खिलाकर चल दिये।

कह रहे हैं ये हुनर है खानदानी सो अलग।।

है अना गिरवी मरी संवेदनाये भी सुनो।

ज़िंदा है गर मर गया आँखों का पानी सो अलग।।

घोलकर नफ़रत हवा में वो बहुत मग़रूर है।

चाहिए उनको नियामत आसमानी सो अलग।।

लूटकर चलती बनी मुझको अकेला छोड़कर।

अब कहूँ क्या तुम हो दिल की राजधानी सो अलग।।

ढंग से इक काम…

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Added by ram shiromani pathak on May 7, 2018 at 9:53am — 15 Comments

खुद को भी समझाना होगा (गीत)

नये वर्ष में लगता है अब

खुद को भी समझाना होगा

कर जय पराजय की समीक्षा

क्या कमीं क्या क्या प्रबल है

तूने जो खोया या पाया

तेरे कर्मों का ही फल है

पूर्व की उनसब गलतियों को

फिर से ना दुहराना होगा

खुद को भी समझाना होगा।

अपने मन की करता है बस

क्या तूने सोचा है क्षण भर

अनायास ही भाग रहा है

अब यहाँ वहाँ किस ओर किधर

पहले यह निश्चय करना है

तुमको जिस पथ जाना होगा

खुद को भी…

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Added by ram shiromani pathak on December 31, 2017 at 1:30pm — 8 Comments

दोहे(प्रेम पियूष)22

प्रेम सुमन का है गहन ,हवा चल रही मंद।
मैं अलि सम पीता फिरूँ,मधुर-मधुर मकरंद।।

तुम बिन किससे हो प्रिये,अपने दिल की बात।
नहीं बीतता दिवस अब,नहीं बितती रात।।

अधरों पर फिर से खिली,मृदुल मौन मुस्कान।
सच कहता हूँ हे प्रिये,लोगी मेरी जान।

ढाई आखर प्रेम का,लिए हाथ में हाथ।
जीवन भर चलना प्रिये,हरदम मेरे साथ।।

खुद को मीरा कह रही,मुझको माखनचोर।
दिखता मैं उसको सदा,कण कण में चहु ओर।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on September 14, 2016 at 8:14pm — 10 Comments

ग़ज़ल

22 22 22 22

मुझसे रोज़ कहा करता है।
दिल में इक दरिया रहता है।।

बे मौसम बारिस भी होगी।
आँखों का काज़ल कहता है।।

सूरज शायद गुस्से में है।
गर्मी में ज्यादा तपता है।।

उसकी भी मज़बूरी होगी।
अंदर ही अंदर घुटता है।

मुझको पूछ रहा था वो।
आँखों से ये क्या बहता है।।

राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 16, 2016 at 2:25pm — 2 Comments

दोहे(विविधा-21)

सृत्वा सोम सुरेश शिव,नंदीश्वर नटराज।
अनघ अघोर अज्ञेय जी,पूर्ण करें सब काज।।

गंगा जल व् विल्व पत्र,लिए पुष्प मंदार।
हे शेखर अर्पित करूँ,स्वीकारें अभिसार।।

जीवन भर ऐसा रहे ,हो उनका सम्मान।
माता बहना रूप जो,उनको अर्पण जान।।

संगी साथी या सखा,कह दूँ तुमको मित्र।
इक दूजे में यूँ बसे, जैसे छाया चित्र।।

कितना किसने कब दिया,है कितना अनुपात।
स्वार्थ दिखे सम्बन्ध पर,हावी मुझको तात।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 8, 2016 at 2:30pm — 4 Comments

दोहे(विविधा-20)

वो अपने घर बो रहा,फिर से नया बबूल।

इसीलिए नाराज़ है,उसके घर के फूल।।



उन्हें देख फिर से हुआ,ऐसा मेरा हाल।

ठिठुरे तन को घूप ज्यों, शुक को मिले रसाल।



उन्हें देख फिर से जगी,ऐसी नई उमंग।

गगन बीच मन उड़ रहा,जैसे उड़े पतंग



फटे वस्त्र औ भूख का,मचा हुआ है शोर।

जाकर कुछ तो दीजिये,नेता जी उस ओर।



मुझे देख उनको लगा,हुआ मुझे उन्माद।।

नयनों से वाचन किया,अधरों से अनुवाद।।



उन्हें देख फिर खिल उठा,मन का पावन फूल।

प्रकृति सुंदरी ने… Continue

Added by ram shiromani pathak on March 9, 2016 at 5:40pm — 4 Comments

भूख हो रोटी न हो तो आप हँसकर देखिये।।

2122 2122 2122 212



भूख हो रोटी न हो तो आप हँसकर देखिये।।

मुफलिसी कहते है किसको इक नज़र कर देखिये।।



आशियाँ उजड़ा है उनका और वे बेघर हुए।

उन परिंदों की लिये खुद को शज़र कर देखिये।।



क्यों भटकते हो भला इस तंग दुनियाँ में मनुष।

इक दफे बस आप अपने घर को घर कर देखिये।।



तोड़ता दिन रात पत्थर चंद सिक्को के लिए।

उसके जैसी बेबसी को भी सहन कर देखिये।।



ख़्वाब नींदों को चुरा सकता नहीं इस शर्त पर।

शब को'दीपक'आप भी इक दिन सहर कर…

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Added by ram shiromani pathak on February 5, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

बदन पे वही लिबास भाई।

22 22 22 22
बदन पे वही लिबास भाई।
दिखता फिर से उदास भाई।।

कड़वी बातें क्यों करते हैं।
कुछ तो रखिये मिठास भाई।।

वादों की बौछार न करिये।
सच में हो इक प्रयास भाई।।

मरा भूख से फिर भी देखो।
लगते क्या क्या कयास भाई।।

चाँद तारे किस काम के जब।
दीपक से घर उजास भाई।।
********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 31, 2015 at 10:00am — 26 Comments

मेरे गृह भी आये दिनकर(नवगीत)

नभ के हाँथ गुलाल हो गया

मुख प्राची का लाल हो गया

मेरे गृह भी आये दिनकर



प्रथम किरण के साथ साथ ही

तम को जैसे जेल हो गया

रवि आते हैं तम जाता है

लुका छिपी का खेल हो गया

बदली के पीछे से देखो

ताँक झाँक करते रह रहकर

मेरे गृह भी आये दिनकर



मादक सी अँगड़ाई लेती

कलियों की मुस्कान देख लो

कोयल गाती है किस धुन में

उसकी प्यारी गान देख लो

ताली बजा रहें है पत्ते

झूम झूमकर नाचे तरुअर

मेरे गृह भी आये दिनकर



इन्द्र… Continue

Added by ram shiromani pathak on January 6, 2015 at 10:55am — 6 Comments

दोहा गीत (सुबह -सुबह)

देखो फिर से हो गया
मुख प्राची का लाल।

रविकर के आते हुआ सुन्दर सुखद प्रभात।
तरुअर देखो झूमते नाच रहें हैं पात।
किरणों ने कुछ यूँ मला इनके गाल गुलाल।

मंद मंद यूँ चल रही शीतल मलय बयार।
प्रकृति सुंदरी कर रही अपना भी शृंगार।।
फ़ैल गया चारो तरफ किरणों का जब जाल।

जन जीवन सुखमय हुआ,समय हुआ अनुकूल।
कोयल भी अब गा रही,खिले खिले हैं फूल।।
ठिठुरे तन को घूप ज्यों शुक को मिले रसाल।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 5, 2015 at 10:30am — 19 Comments

उनको अपने पास लिखूँ क्या?

उनको अपने पास लिखूँ क्या?
वो मेरे हैं ख़ास लिखूँ क्या?

तारीफ़ बहुत कर दी उनकी।
अपना भी उपहास लिखूँ क्या?

संत नहीं वह व्यभिचारी है।
उसका भी सन्यास लिखूँ क्या?

जिसने मेरा सबकुछ लूटा।
उसपे है विश्वास लिखूँ क्या?

जिसकी कोई नहीं कहानी।
उसका भी इतिहास लिखुँ क्या?

बूँद बूँद को तरसा है जो।
उससे पूँछो प्यास लिखुँ क्या?
************************
वज़्न_22 22 22 22
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on December 29, 2014 at 5:17pm — 19 Comments

शब ही नहीं सहर भी तू है।

22 22 22 22
शब ही नहीं सहर भी तू है।
मेरी ग़ज़ल बहर भी तू है।।

मेरे ज़ख्मों पे यूँ लगती।
मरहम साथ असर भी तू है।।

बहुत खूबसूरत है दुनियाँ।
ऐसी एक नज़र भी तू है।।

जीवन के हर पथ में मेरे।
मंजिल और सफ़र भी तू है।।

शाहिल तक पहुचाने वाली।
मेरी वही लहर भी तू है।।
**********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 4:00pm — 18 Comments

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