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एक ही सच्चा किरदार

एक ही सच्चा किरदार।
बाकी सब किरायेदार।।

खुद को इंशा कहता है।
उसके गम भी ले उधार।।

कितने भूंखे मरते हैं।
कभी तो पढ़ ले अखबार।।

बड़ा अज़ीब बन्दा है वो।
दुश्मनों से करता प्यार।।

जबसे प्यार कर लिया है ।।
लोग कहते हैं बीमार।।

तुझको फिर से नज़र लगी।
जाके कभी नज़र उतार।।
*********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 3, 2014 at 9:40pm
बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना भाई राम शिरोमणि जी...सोच में नयापन है और उसके चित्रण में भी. अभिनंदन.
Comment by Vindu Babu on December 3, 2014 at 6:23am

सार्थक रचना हुई है आदरणीय रामजी।
सादर बधाई।

Comment by ram shiromani pathak on November 27, 2014 at 2:55pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय योगराज जी।।सादर

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 12:04pm

बहुत खूब भाई राम शिरोमणि जी. हार्दिक स्वीकारें।

Comment by ram shiromani pathak on November 27, 2014 at 12:04am
आदरणीया सविता जी बहुत आभार
Comment by ram shiromani pathak on November 27, 2014 at 12:03am
महर्षि भाई बहुत आभार
Comment by ram shiromani pathak on November 27, 2014 at 12:02am
विजय निकोर जी बहुत आभार
Comment by savitamishra on November 26, 2014 at 6:18pm

बहुत सुन्दर कविता

Comment by maharshi tripathi on November 26, 2014 at 5:49pm

 सुन्दर रचना  के लिए बधाई,,,,,,,,,,राम जी |

Comment by vijay nikore on November 26, 2014 at 5:42pm

सुन्दर अर्थपूर्ण रचना के लिए बधाई, आदरणीय राम जी।

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