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दोहे-१७ (प्रेम पियूष)

खिली रातरानी यहाँ,हुई रुपहली रात!
कानों में आ फिर कहो,वही प्यार की बात !!

 

अधरों से बातें करें,नयनों से आदेश!
घायल कर जाती सदा,झटके जब वे केश !!

 

कर में कर लेकर किया,हमने यूँ अनुबंध!
खिला रहे फूले फले,प्यारा मृदु सम्बन्ध !!

 

वही रुपहली रात है,सुन्दर सुखद प्रभात!
लेकिन तुम बिन हो प्रिये,किससे मन की बात !!

 

दीवाना कुछ यूँ हुआ,न दिवस दिखे न रात !
खुद से ही करने लगा,बहकी बहकी बात!!
*************************************************
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on July 21, 2014 at 9:10pm

बढिया प्रयास हुआ है. शुभकामनाएँ

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:46pm

उत्साह वर्धन हेतु  हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण  जी। … सादर

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:45pm

सुझाव के लिए हार्दिक आभार आदरणीय गोपाल  जी। … सादर

Comment by ram shiromani pathak on July 20, 2014 at 2:44pm

हार्दिक आभार भाई जीतेन्द्र जी। … सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2014 at 11:41am

आ0 भाई राम सिरोमणी जी प्रेमपगे लाजवाब दोहों के लिए बहुत बहुत बधाई ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 14, 2014 at 2:50pm

प्रिय

दोहे के सम चरण की रचना  4+4+3 या 3+3+2+3   होती है  इस लिहाज से  ' न दिवस दिखे न रात ' में प्रथम न उच्चारण में 'ना ' हो जाता है  i इसे यदि  'दिवस दिखे  नहि रात ' करे तो 3+3+2+3  का संगठन पूरा हो जाएगा i

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2014 at 10:16am

बहुत ही सुंदर दोहावली, बधाई आदरणीय राम शिरोमणि जी

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