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उसकी खातिर करो दुआ प्यारे।।
इस तरह से निभा वफ़ा प्यारे।।

जो हो शर्मिंदा अपनी गलती पे।
उसको हर्गिज न दो सजा प्यारे।।

माना पहुँचे हो अब बुलंदी पर।
तुम न खुद को कहो खुदा प्यारे।।

कत्ल करके वो मुस्कुराता है।
कितनी क़ातिल है ये अदा प्यारे।।

जिनको रोटी की बस जरूरत है।
उनपे बेकार सब दवा प्यारे।।

'राम' बुझने को हैं उन्हें छोड़ो।
दें चरागों को क्यूँ हवा प्यारे।।

मौलिक अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

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Comment by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 12:01pm

लक्ष्मण भाई बहुत आभार आपका

Comment by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 12:00pm

आरिफ भाई हौसला बढ़ाने के लिए आभार आपका

Comment by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 12:00pm

बहुत आभार महाजन जी।।

Comment by ram shiromani pathak on May 17, 2018 at 12:00pm

कबीर साहब बहुत बहुत आभार आपका।।सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 15, 2018 at 1:52pm

आ. भाई रामशिरोमणि जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Mohammed Arif on May 15, 2018 at 10:55am

आदरणीय राम शिरोमणि जी आदाब,

                       एक अच्छी ग़ज़ल का सफल प्रयास । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का संज्ञान लें ।

Comment by Harash Mahajan on May 13, 2018 at 4:58pm

अच्छे अहसास हुए हैं आदरणीय पाठक जी ।

बाकी गुनुजनों की बात पर ध्यान देना आवश्यक है ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on May 13, 2018 at 2:16pm

जनाब राम शिरोमणि पाठक जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है देखिएगा, सानी मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'वो भी करने लगे वफ़ा प्यारे'

कृपया ध्यान दे...

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