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वो अपने घर बो रहा,फिर से नया बबूल।
इसीलिए नाराज़ है,उसके घर के फूल।।

उन्हें देख फिर से हुआ,ऐसा मेरा हाल।
ठिठुरे तन को घूप ज्यों, शुक को मिले रसाल।

उन्हें देख फिर से जगी,ऐसी नई उमंग।
गगन बीच मन उड़ रहा,जैसे उड़े पतंग

फटे वस्त्र औ भूख का,मचा हुआ है शोर।
जाकर कुछ तो दीजिये,नेता जी उस ओर।

मुझे देख उनको लगा,हुआ मुझे उन्माद।।
नयनों से वाचन किया,अधरों से अनुवाद।।

उन्हें देख फिर खिल उठा,मन का पावन फूल।
प्रकृति सुंदरी ने किया,सबकुछ यूँ अनुकूल।।

नेता इनको ना कहें,ये लगते बटमार।
तन से उजले है भले,मन से है बीमार।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Rahul Dangi on March 13, 2016 at 10:01pm
बहुत सुन्दर
Comment by narendrasinh chauhan on March 11, 2016 at 2:15pm

सुन्दर दोहावली

Comment by ram shiromani pathak on March 10, 2016 at 8:10pm
रामबली जी हार्दिक आभार।।सादर
Comment by रामबली गुप्ता on March 10, 2016 at 7:24pm
हार्दिक बधाई स्वीकार करें आ. शिरोमणि जी
श्रृंगार और नेताजन दोनों पर अच्छे दोहे

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