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"हास्य घनाक्षरी"

1-

लड़ती पीट तालियाँ, हज़ार देती गालियाँ,
अच्छे भले दिमाग का, दही कर देती है |

हर पल तंग करे, उल्टे पुल्टे कर्म करे,
मंगल जैसे ग्रह को, शनि कर देती है |

यदि देख लिया पैसा, पूछे नही कि है कैसा,
झट-पट बटुए को, खाली कर देती है |

भूल से भी पूछ लिया, पैसा कहाँ खर्च किया,
इतनी सी बात पे ही, ठोक पीट देती है |

२-
वाणी में मधुरता थी ,जब कहती थी स्वामी !
याद वो आते है दिन ,रुआंसा हो जाता हूँ !!

वो पुराने दिन अब, सपने से लगते है !
पति कम ज्यादा अब ,टॉमी बन जाता हूँ !!

हरदम आगे पीछे ,दुम हिलाना पड़ता है !
इतना बुरा हाल है ,नौकर कहाता हूँ !!

इतनी बड़ी सजा को ,जैसे तैसे झेल रहा !
मान बैठा नियति मै,गमो को पी जाता हूँ !!

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on April 18, 2013 at 3:09pm

हार्दिक आभार  केवल भाई ///////////

Comment by ram shiromani pathak on April 18, 2013 at 3:08pm

हार्दिक आभार अशोक सर/////////

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 18, 2013 at 10:27am

आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी,  सुप्रभात व सादर प्रणाम!  वाह अतिसुन्दर, लाजवाब, हास्य ही हास्य।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।   सादर,

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 18, 2013 at 8:04am

सुन्दर घनाक्षरियाँ भाई राम शिरोमणि जी हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by ram shiromani pathak on April 17, 2013 at 12:16pm

हार्दिक आभार योगी जी ///

Comment by Yogi Saraswat on April 17, 2013 at 12:10pm

वाणी में मधुरता थी ,जब कहती थी स्वामी !
याद वो आते है दिन ,रुआंसा हो जाता हूँ !!

वो पुराने दिन अब, सपने से लगते है !
पति कम ज्यादा अब ,टॉमी बन जाता हूँ !!

मेरा भी हाल कुछ तेरे जैसा है , अब मुझसे ज्यादा उसे प्यारा पैसा है ! हहहाआआअ गज़ब का लिखते हैं आप राम शिरोमणि जी

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