मुझको गले लगाती है।
तब जाकर फुसलाती है।।
कितने मरते होंगे जब।
होठ चबा मुस्काती है।।
चूम चूमकर आँखों से।
मेरा दर्द बढ़ाती है।।
जलन चाँद को होती है।
वो छत पे जब आती है।।
छिपकर देखा करती है।
मैं देखूँ छिप जाती है।।
2222222
मौलिक अप्रकाशित
राम शिरोमणि पाठक
Comment
अमुल्य सुझाव हेतु हार्दिक आभार आपका खान साहब।।
यूँ कर लिया है।
मुझको गले लगाती है।
तब जाकर फुसलाती है।।
कितने जलते होंगे जब।
मुझसे वो बतियाती है।।
चूम चूमकर आँखों से।
मेरा दर्द बढ़ाती है।।
देखा करती है छिपकर।
मैं देखूँ छिप जाती है।।
जलता है ये चाँद बहुत।
वो छत पे जब आती है।।
राम शिरोमणि पाठक
जनाब राम शिरोमणि साहिब , ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें। जनाब समर साहिब और जनाब नीलेश जी की बातों का संज्ञान लें ।शेर2 सानी यूँ कर सकते हैं " हँसी वो लब पे लाती है "। सही शब्द छुप है छिप नहीं ,देखियेगा ।
जी बहुत बहुत आभार कबीर साहब
'होती जलन है चाँद को'
ये मिसरा बह्र में नहीं है,इसे यूँ करें:-
'जलता है ये चाँद बहुत
वो छत पे जब आती है'
कबीर साहब सुझाव हेतु हार्दिक आभार।।
देखा करती है छिपकर।
मैं देखूँ छिप जाती है।।
होती जलन है चाँद को।
वो छत पे जब आती है।।
शायद दोष अब दूर हो गया
जनाब राम शिरोमणि पाठक जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
'जलन चाँद को होती है
वो छत पे जब आती है'
'छिप कर देखा करती है
मैं देखूँ छिप जाती है'
इन दोनों अशआर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है,इसे बदलने का प्रयास करें ।
आ. रामशिरोमणि जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है ... मुस्काती शब्द ठीक नहीं है ..अस्ल शब्द मुस्कुराती है ..
ग़ज़ल के लिए बधाई
सादर
आरिफ़ भाई इस मुहब्बत के बहुत बहुत आभार आपका।।आगे से ध्यान रखूंगा
आदरणीय राम शिरोमणी जी आदाब,
कठिन बह्र पर बहुत ही अच्छे अश'आर । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । आपने अर्कान नीचे लिखें हैंं । प्राय: अर्कान ग़ज़ल के ऊपर लिखें जाते हैं । बाक़ी गुणीजन आपनी राय देंगे ।
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