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उम्रभर।
मोतबर।।

मुश्किलें।
तू न डर।।

ताकती।
इक नज़र।।

धूप में।
है शज़र।।

वो तेरा।
फिक्र कर।।

रात थी।
अब सहर।।

इश्क़ ही।
शै अमर।।

मौलिक/अप्रकाशित

राम शिरोमणि पाठक

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2018 at 12:22pm

आ. भाई राम शिरोमणि जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 21, 2018 at 3:07pm

यानी रामशिरोमणी भाई एक रुक्नी पर हाथ आज़मा रहे हैं ! बढिया प्रयास हुआ है.. 

शुभातिशुभ

Comment by Neelam Upadhyaya on June 20, 2018 at 3:23pm

आदरणीय  राम शिरोमणि पाठक जी, नमस्कार।  बहुत ही उम्दा रचना की  प्रस्तुति के लिए बधाई ।  

Comment by Samar kabeer on June 20, 2018 at 2:33pm

जनाब राम शिरोमणि पाठक जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,इस पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by ram shiromani pathak on June 20, 2018 at 9:05am

बहुत बहुत आभार गुमनाम भाई।।सादर

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 19, 2018 at 6:48pm

वाह वाह वाह वाह..... कमाल श्रीमान वाह

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2018 at 2:45pm

बहुत बहुत आभार आरिफ़ भाई।।सादा

Comment by Mohammed Arif on June 19, 2018 at 12:42pm

राम शिरोमणि जी आदाब,

                       बहुत बेहतरीन ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2018 at 12:09pm

बहुत आभार बसंत जी।।सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 19, 2018 at 9:56am

वाह बहुत खूब 

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