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लघुकथाः कुत्ता

"पापा ,आपको अब हमारे यहाँ दो महीने हो गए हैं, अब छोटू का नंबर है !आपकी टिकट करवा दी है !"

"ठीक है ,बेटा !"

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by वेदिका on October 14, 2014 at 11:51am
क्या कहा जाय; :'( लेखन की मार्मिक भावभूमि रही।
सादर !!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 14, 2014 at 10:43am

उफ्फ्फ़ ...माँ बाप की ममता तो सभी बच्चों  के लिए हृदय में बराबर होती है फिर बच्चे क्यूँ उनको टुकड़ों- टुकड़ों में जीने के लिए मजबूर करते हैं शीर्षक उनकी स्थिति को सटीकता से परिभाषित कर रहा है ...दिल पर आघात करती हुई लघुकथा बेहद प्रभावशाली .बधाई आपको नीलेस शर्मा जी .


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 14, 2014 at 10:31am
वाह !! लघुकथा तो सुन्दर है ही, लेकिन इसने शीर्षक को भी सार्थक किया है. हार्दिक बधाई भाई नीलेस शर्मा जी.

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