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रामकिशन अपनी फसल से बहुत ज्यादा  प्यार करता था. पौधों को अपने बच्चों के जैसा समझता. खेतों की साफ़-सफाई, हर काम शुरू करने से पहले पूजा-पाठ, यहाँ तक की अपनी भावुकता के कारण नन्हें-नन्हें पौधों पर कीटनाशकों का छिडकाव भी नहीं करता था. उसे यही लगता था कि इन मासूमों पर जहर का इस्तेमाल कैसे करूँ..?   किन्तु ख़राब मौसम के कारण जन्मे कीट उसकी फसल को चट कर जाते. अपने हाथ कुछ न लगना और गाँव के लोगों द्वारा उसकी  हंसी उड़ाना , एक दिन उसे समझ आ गया. अब रामकिशन अपनी फसलों से आमदनी का भरपूर फायदा ले रहा है..

 

         जितेन्द्र ‘गीत’

  (मौलिक व् अप्रकाशित)    

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 4, 2014 at 11:15pm

आपका बहुत -बहुत आभार, आदरणीय सोमेश जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 4, 2014 at 11:14pm

लघुकथा पर आपकी उपस्थिति, मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम है आदरणीय योगराज जी. आपका ह्रदय से आभारी हूँ, स्नेह व् मार्गदर्शन बनाए रखियेगा

सादर!

Comment by somesh kumar on November 4, 2014 at 3:05pm

acchi lghuktha,mrm ko smjhne ke lie mujhe 3 baar pdhna pdha,fir smjha ye bhavukta ke aavrn ke bare m hai ,bdhai


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 4, 2014 at 12:14pm

व्यावसायिकता अक्सर भावुकता पर हावी हो ही जाया करती है, वैसे भी घोडा अगर घास से दोस्ती करने लगे तो भूखो ही मरेगा न ? अच्छी लघुकथा है। 

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