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गज़ल ज़िन्दगी जाती सरकती..... सीमा हरि शर्मा

जिंदगी जाती सरकती

ज़िन्दगी जाती सरकती।
लाख पकड़ो कब ठहरती।

जो भी पल समझा मुकम्मल।
फिर नई इक दौड़ चलती।

सूर्य समझा जो सहर का।
शाम थी लाली फिसलती।

थक चुका है जिस्म चलते।
चाह से क्या जां निकलती।

धुन्द जब है कुछ पलों की।
रश्मि आखिर क्यों अटकती।

झूमती दिखती जो डाली।
आँधियों से है सिहरती।

रात से लड़ता है दीपक।
आस सुबहा की मचलती।
सीमा हरि शर्मा 24.12.2014
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:17pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी बहुत बहुत आभार ।
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:15pm
आदरणीय gumnaam pithoragarahi जी बहुत बहुत आभार
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:11pm
आदरणीय Vanadna जी ब्वाहुत बहुत आभार स्नेह बनाये रखें।
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:08pm
आभार आ.Shyam Narain Verma जी।
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:05pm
आदरणीय गोपाल नरायन श्रीवास्तव जी बहुत बहुत आभार आपने गजल को पसंद किया स्नेह आशीर्वाद बनाये रखें सादर।
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 3:02pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय Hari Prakash Dubey जी। होंसला बढ़ाने के लिए
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 2:58pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आप गजल के पारखी एवं गजल को गहराई से जानने वाले हैं आप गलती नही कर सकतें हैं हो सकता है बारीकी में जाने पर कुछ गलतियाँ हो आपसे सदैव मार्गदर्शन की अपेक्षा है सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on December 25, 2014 at 6:04pm

जो भी पल समझा मुकम्मल।
फिर नई इक दौड़ चलती।.....सुन्दर रचना आदरणीया सीमा हरि शर्मा जी, हार्दिक बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2014 at 12:23pm

सीमाहरी जी

अच्छी गजल हुयी है i

थक चुका है जिस्म चलते।
चाह से क्या जां निकलती।

धुन्द जब है कुछ पलों की।
रश्मि आखिर क्यों अटकती।

Comment by Shyam Narain Verma on December 25, 2014 at 11:38am

आपको इस उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

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