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जागो, सितारे और भी हैं.

क्यों बैठ गए तुम थककर,
ओढ़ विफलताओं की चादर;
उठो, नतीजे और भी हैं.

इक घोंसला ही उजड़ा है,
चमन पूरा ही बाकी है;
जोड़ो, कि तिनके और भी हैं.

नदी के इक किनारे पर,
जो नाविक लौट न आया;
ढूंढो, किनारे और भी हैं.

तुम्हारे आँगन में तारा,
नहीं टूटा तो रोते हो;
जागो, सितारे और भी हैं.

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2011 at 9:01am
बेहद सकारात्मक सोच के साथ लिखी गई रचना , सुंदर भाव , खुबसूरत अभिव्यक्ति हेतु साधुवाद |
Comment by neeraj tripathi on March 12, 2011 at 8:17am
sab ka aabhar
Comment by Rash Bihari Ravi on March 11, 2011 at 1:28pm
khubsurat

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