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भावनात्मक दरारें

माता पिता की ज़ख्मों वाली पीठ,
को न सहलाना,
परिवार की मुस्कुराहटों में,
न मुस्काना,
दोस्तों की खामोशियों में,
चुप रह जाना,
अपनों के दिलों में,
न झाँक पाना,
हमारी मजबूरियां नहीं,
कमजोरियां हैं,
जो अक्सर अपने,
बंधनों के,
एक धागे को,
तोड़ जाती हैं,
भावनात्मक दरारें हैं ये,
नहीं भरो तो,
निशान छोड़ जाती हैं .

किसी शीतल सुबह,
अपनी हथेलियों में,
ओस की बूँदें भरो,
अपने अहं को कर किनारे,
उसमे मिलाओ,
प्रेम की बहारें,
और कर दो अर्पित,
अपनों को सारे.
ये कोई खाइयाँ नहीं हैं,
की न पाट पाओगे,
भावनात्मक दरारें हैं ये,
अपनों की अपनों से,
प्यार से समझ जाएँगी,
बहुत पानी नहीं चाहिए,
इनके लिए,
महज़ ओस से ही,
भर जाएँगी.


Views: 593

Comment

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Comment by neeraj tripathi on April 12, 2011 at 5:42pm
dhanyavaad Dr Naman ji
Comment by डॉ. नमन दत्त on April 12, 2011 at 5:40pm
बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रचना है...इसके लिए साधुवाद स्वीकारें....
Comment by neeraj tripathi on April 9, 2011 at 5:35pm
Thanks Lataji
Comment by Lata R.Ojha on April 9, 2011 at 5:25pm
bahut sundar .. :)
Comment by neeraj tripathi on April 9, 2011 at 3:59pm
dhanyavaad rajiv ji evam arunji
Comment by Abhinav Arun on April 9, 2011 at 3:27pm
सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना साधुवाद स्वीकार करें !!
Comment by Rajeev Mishra on April 5, 2011 at 5:27pm

bahut hi sunder rachna

 

ek sunder sandesh

Comment by neeraj tripathi on April 5, 2011 at 9:26am
Thank you Ashish ji.
Comment by आशीष यादव on April 5, 2011 at 8:07am

भावपूर्ण कविता,

बहुत पानी नहीं चाहिए,
इनके लिए,
महज़ ओस से ही,
भर जाएँगी.

सचमुच हृदयस्पर्शी|

Comment by neeraj tripathi on April 5, 2011 at 7:11am
vivekji...dhanyavaad

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