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ग़ज़ल - उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में

OBO पर आकर बहुत अच्छा लगा. यहाँ पर एक से एक उस्ताद शायर और कवियों की रचनाएं पढ़कर आनंद आ गया.
अपनी एक नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, आप सब से मार्गदर्शन की आशा है.


अँधेरा है नुमायाँ बस्तियों में
उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में

ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं
लहू भरना ही होगा अब दीयों में

फ़लक पर जो दिखा था एक सूरज
कहीं गुम हो गया परछाइयों में

तेरी महफ़िल से जी उकता गया है,
सुकूँ मिलता है बस तन्हाईयों में

लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में

उतरना ध्यान से दरिया में 'साहिल'
मगरमच्छ भी छुपे हैं, मछलियों में

 

--- संदीप 'साहिल'

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Comment

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Comment by Saahil on June 14, 2011 at 8:53pm
शुक्रिया नमन जी!
Comment by डॉ. नमन दत्त on May 14, 2011 at 4:26pm
ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं
लहू भरना ही होगा अब दीयों में

लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में

बेहद गहरे सन्दर्भ..खूबसूरत और नए प्रतिमानों के साथ....
इसके लिए अंतःकरण से बधाई स्वीकारें....
Comment by Saahil on March 22, 2011 at 3:28am
वीनस जी और राजेश जी,
हौसला बढ़ने का शुक्रिया!
Comment by राजेश शर्मा on March 20, 2011 at 9:33am
लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में
इस शेर में गज़ब का विस्तार है.यादों के झोंके भी सिगरेट के कश की तरह ही आनंद देते हें लेकिन दोनों की ही अधिकता घातक भी होती है
याद के लिए नया  प्रतीक पहली बार देखा  . साहिल जी,अच्छे शेरों के लिए बधाई .   
Comment by वीनस केसरी on March 20, 2011 at 2:02am
लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में

बहुत उम्दा शेर कहा है

बधाई कबूल करें
Comment by Saahil on March 20, 2011 at 1:31am
वंदना जी, योगराज जी, अरुण जी
दाद के लिए बहुत शुक्रिया!
Comment by Abhinav Arun on March 18, 2011 at 8:13pm

वाह साहिल जी क्या खूब शेर कहे आपने बिलकुल प्रासंगिक और प्रभावी अंदाज़ है आपका | बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं आपको |

लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में

बिलकुल नए तरह का शेर नयी ज़मीन पर ..बहुत बहुत बधाई |


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 17, 2011 at 11:58am

संदीप साहिल जी, छोटी बहर में बहुत ही आला पाए के आशार कहे हैं आपने, पढ़कर दिल को सुकून मिला ! यूँ तो सभी शे'र बहुत खूबसूरत हैं मगर यह शे'र हुस्न-ए-ग़ज़ल है :

 

//लिए जाता हूँ काश, मैं फिर लिए हूँ,

तेरी यादों का सिगरेट उँगलियों में !//

 

वाह वाह वाह - बहुत खूब !


Comment by Saahil on March 16, 2011 at 8:43pm
गणेश जी और विवेक जी, होंसला बढ़ने के लिए शुक्रिया!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 16, 2011 at 8:31pm
ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं
लहू भरना ही होगा अब दीयों में.............वाह वाह , बेहद उम्द्दा ख्यालात

तेरी महफ़िल से जी उकता गया है,
सुकूँ मिलता है बस तन्हाईयों में........कभी कभी ऐसा होता है जब बनावटीपन से दिल उब सा जाता है और जी चाहता है की प्रकृति के संग बिलकुल तन्हा रहा जाय , सच्ची बयानी,

लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में.....वाह भाई जी वाह, पहली बार सुना यादों की सिगरेट के बारे में, बहुत ही खुबसूरत उपमा अलंकार का प्रयोग |

उतरना ध्यान से दरिया में 'साहिल'
मगरमच्छ भी छुपे हैं, मछलियों में........बिलकुल सत्य , बहुत ही सुंदर मकता निकाला है ,

सब मिलाकर एक बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति , उम्द्दा अभिव्यक्ति , मतले से लेकर मकता तक कसी हुई ग़ज़ल , कोटिश: बधाई स्वीकार करे संदीप जी |

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