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इस मरुस्थल को नदी की धार दो

गीली माटी हूँ, मुझे आकार दो
मेरे जीवन को कोई आधार दो

घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो

फिर धरा पर प्रेम बन बरसो कभी
इस मरुस्थल को नदी की धार दो

मोर को सावन, भंवर को फूल दो
सबको अपने हिस्से का संसार दो

स्वप्न के पंछी नयन-पिंजरे में हैं,
दो इन्हें आकाश का विस्तार दो

हूँ अगर जीवित तो तट पर क्या करूँ?
मेरी नैया को कोई मझधार दो

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Comment

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Comment by Saahil on April 25, 2011 at 8:59pm
shukriya Tapan ji
Comment by Tapan Dubey on April 22, 2011 at 8:59pm
घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो

Bahut khub sahil ji....
Comment by Saahil on April 22, 2011 at 8:09pm
shukriya Ashish ji!
Comment by आशीष यादव on April 22, 2011 at 7:35pm

har sher umda,

ek khubsurat ghazal ke liye bahut bahut badhai.

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