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कैसे होते हैं ये रिश्ते
कभी दूर, कभी पास
कभी अपने, कभी पराये
कभी सच्चे, कभी झूठे
कभी नादाँ, कभी ग़मगीन
कभी उम्रदराज़, कभी कमसिन
कभी हठीले, कभी गर्वीले
तो कभी कभी सिफारशी भी होते हैं ये रिश्ते
कभी कभी गुमनाम भी होते हैं रिश्ते
कभी कभी बदनाम भी हो जाते हैं रिश्ते
कभी एक दुसरे को कसूरवार भी ठहराते हैं रिश्ते
कभी कभी निभ जाते और कभी कभी निभाने भी पड़ते हैं रिश्ते
कभी अपनी खातिर और कभी दूसरों के लिए वक़्त मांगते हैं रिश्ते
कभी खुद में सिमट जाते और कभी रुस्वा भी हो जाते हैं रिश्ते
क्या इंसा इन रिश्तों से बच पाया है, बच सकता है
जब तक है सांस, निभाते ही तो हैं रिश्ते
तो क्यों न इन रिश्तों को मन से निभाएं
बोझ न समझें और हमेशा मुस्कुराएं
क्योंकि रिश्तों की ख़ूबसूरती इसी में है
आप भी मुस्कुराएं और जग भी मुस्कुराये

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Anurag Goel on February 3, 2015 at 6:58pm

आपको भी साधुवाद मेरे प्रयास की सराहना के लिए. ऑनलाइन प्लेटफार्म पर मेरे मित्र के सहयोग से मुझे इस वेबसाइट के बारे में पता चला. लिखना मेरा शौक है, छात्र जीवन से ही. आप जैसे गुणीजनों के सान्निध्य में कुछ नया करने को तथा सिखने को मिलेगा ऐसी आशा है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2015 at 6:29pm

रिश्तों को कई दृष्टिकोण से परखती प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय अनुराग जी,

आपकी किसी पहली रचना से गुजर रहा हूँ.... संभवतः मंच पर भी आपकी पहली रचना है. इस प्रयास के लिए साधुवाद निवेदित है. कविता के शिल्प पर गुनीजन ही बताएँगे.

कृपया ध्यान दे...

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