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“बेटा!.. तुझे याद है न.. जब तू स्कूल में प्रथम श्रेणी  में आया था ,  मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी . सभी लोग  यही कह रहे  थे  कि मेरा बेटा है" 

“ हाँ!..पर रात-दिन पढाई मैंने की थी, आपने जो किया था  वो आपका फर्ज था "

“ हाँ! बेटा यही समझ ले, बस मुझे इसी घर में रहने दे. अब गली-गली दरबदर फिरूंगा, तो लोग यही कहेंगे की तेरा बाप हूँ...”

    जितेन्द्र पस्टारिया

 (मौलिक व् अप्रकाशित )

 

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 26, 2015 at 9:10pm

आपके प्रोत्साहन व् लघुकथा की सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभार, आदरणीय गिरिराज जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2015 at 10:21pm

बहुत मार्मिक लघुकथा लगी , आदरणीय जितेन्द्र भाई , आज कल के परिवारिक रिश्तों की यही हालत है !! आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 9:44pm

लघूकथा आपको पसंद आई , लेखनकर्म सार्थक हुआ आदरणीय गुमनाम जी. आपका ह्रदय से आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 9:42pm

उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार, आदरणीय परी एम. श्लोक जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 9:40pm

आदरणीय वीर मेहता जी, लघुकथा पर आपके प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार.

सादर!

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 25, 2015 at 8:38pm

.सुन्दर कथा के लिए बधाई स्वीकार करे.

Comment by Pari M Shlok on February 25, 2015 at 2:49pm
सुन्दर भावपूर्ण कथा ...बधाई ..
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on February 25, 2015 at 11:56am

आदरणीय जितेंदर पस्तारिया जी  आपकी लघुकथा में एक पिता की लाचारी और बेटे की विमुखता दोनों ही विशेष तौर पर उभर कर आयी है,.....सुन्दर कथा के लिए बधाई स्वीकार करे.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:43am

आदरणीय हरिप्रकाश जी, लघुकथा पर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 25, 2015 at 11:41am

आदरणीय खुर्शीद साहब, आप जैसे संजीदा रचनाकार से उत्साह पाना, बहुत ख़ुशी देता है. आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

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