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लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..
आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा
ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में..

किसने बनाये हैं ये सनमकदे...
ख़ुदा भी बंट गया बन्दों में...

मेरी इन्ही आँखों ने,नजर में तेरी ए-सनम
देखा है खुद को कई रंगों में..

है किसे तौफ़ीक जो गैरों के चाक सिले?
मै भी नंगा हो गया नंगों में....

‘’मौलिक व अप्रकाशित’’
२०१४ में उ.प्र. में फैले दंगों के ऊपर
-‘जान’ गोरखपुरी

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 2, 2015 at 11:17pm

शुक्रिया आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी!!

Comment by Hari Prakash Dubey on February 28, 2015 at 10:05am

सुन्दर रचना है भाई कृष्ण मिश्र जी , बधाई आपको !

लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..
आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा, 
ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में.. सुन्दर 

कृपया ध्यान दे...

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