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अजीब है ये जिन्दगी
सलीब है ये जिन्दगी
न जान तू किस खता की
नसीब है ये जिन्दगी
इश्क जिसे है,उसी की
रकीब है ये जिन्दगी
गिने जु सांसे, बहुत ही
गरीब है ये जिन्दगी
निकाह मौत तुझसे औ
हबीब है ये जिन्दगी
‘मौलिक व अप्रकाशित’
Comment
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी!आभार!
आदरणीय vijai shanker जी प्रोत्साहन के लिए तहेदिल से शुक्रिया!!आभार!
भाई गुमनाम जी ऐसे ही अपना स्नेहभाव बनाये रक्खें! बहर में लिखने को प्रयासरत हूँ! सीखना ज़ारी है!सदैव मार्गदर्शन का आकांछी हूँ!इसी प्रकार अपनी नजर मुझपे बनाये रखे!!
शुभकामनाओ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ पांडेय सर! बिल्कुल आपकी बात को संज्ञान में मैंने लिया..और रचनाकर्म की दृष्टि से बहुत लाभप्रद रहा!!समयाभाव और व्यस्तता के कारण उस समय टिप्पणी केवल पढ़ कर रह गया था! आदरणीय आप इसी प्रकार सदैव मार्गदर्शन करते रहे!!यही कामना है!बहुत बहुत आभार अभिनन्दन!
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय shyam नरेन वर्मा जी!
हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Pari M Shlok जी !!
भाई कृष्ण मिश्र जी इस सुन्दर प्रयास ,सुन्दर रचना के लिए बधाई आपको !
कृष्ण मिश्र जी
आपका प्रयास सराहनीय है i बाकी उस्ताद आपको बता ही चुके हैं i सादर i
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