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१२१ २२ १२२

अजीब है ये जिन्दगी

सलीब है ये जिन्दगी

न जान तू किस खता की

नसीब है ये जिन्दगी

इश्क जिसे है,उसी की

रकीब है ये जिन्दगी

गिने जु सांसे, बहुत ही

गरीब है ये जिन्दगी

निकाह मौत तुझसे औ

हबीब है ये जिन्दगी

‘मौलिक व अप्रकाशित’

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:29pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी!आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:28pm
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:26pm

आदरणीय vijai shanker जी प्रोत्साहन के लिए तहेदिल से शुक्रिया!!आभार!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:25pm

भाई गुमनाम जी ऐसे ही अपना स्नेहभाव बनाये रक्खें! बहर में लिखने को प्रयासरत हूँ! सीखना ज़ारी है!सदैव मार्गदर्शन का आकांछी हूँ!इसी प्रकार अपनी नजर मुझपे बनाये रखे!!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:18pm

शुभकामनाओ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ पांडेय सर! बिल्कुल आपकी बात को संज्ञान में मैंने लिया..और रचनाकर्म की दृष्टि से बहुत लाभप्रद रहा!!समयाभाव और व्यस्तता के कारण उस समय टिप्पणी केवल पढ़ कर रह गया था! आदरणीय आप इसी प्रकार सदैव मार्गदर्शन करते रहे!!यही कामना है!बहुत बहुत आभार अभिनन्दन!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:11pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय shyam नरेन वर्मा जी!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 10:11pm

हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Pari M Shlok जी !!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 5, 2015 at 9:48pm

 भाई कृष्ण मिश्र जी इस सुन्दर प्रयास ,सुन्दर रचना के लिए बधाई आपको !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 5, 2015 at 9:16pm

कृष्ण मिश्र जी

आपका प्रयास सराहनीय है i बाकी उस्ताद आपको बता ही चुके हैं i सादर i

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 5, 2015 at 8:12am
वादे से न मुकरे मौत
पूजें हम ये जिंदगी ॥
अच्छी रचना वही है जो वैसा ही सोचने पर मजबूर कर दे , इसलिए बहुत बहुत बधाई, बन्धु , सादर।

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