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ग़ज़ल -- हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है। ( बराए इस्लाह )

1222-1222-122

सफ़र सच का अगर लम्बा बहुत है
मुझे भी हौसला थोड़ा बहुत है

सभी के सामने जो मुस्कुराता
वही छुप छुप के क्यूँ रोता बहुत है

पड़ी है ईद दीवाली इकठ्ठा
नगर में आज़ सन्नाटा बहुत है

गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा
बहाना जो भी हो थोथा बहुत है

कमा कर भेजता वो माँ को पैसे
मगर इक माँ को क्या इतना बहुत है

भँवर में जो फँसा हो उससे पूछो
सहारे के लिए तिनका बहुत है

चले ही जाना सबको इस जहाँ से
हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है

बिसाते वक़्त पर सपनों की बाज़ी
हमारी हार का खतरा बहुत है

ग़ज़ल अब भी मुकम्मल कह न पाया
अगरचे ज़ेहन ने सोचा बहुत है

--------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित) © दिनेश कुमार
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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 23, 2015 at 8:07pm

सभी के सामने जो मुस्कुराता

वही छुप छुप के क्यूँ रोता बहुत है     क्या बात है! क्या बात है!

गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा
बहाना जो भी हो थोथा बहुत है   लाजव़ाब

चले ही जाना सबको इस जहाँ से
हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है  वाह वाह वाह! क्या खूब कहा!

आदरणीय दिनेश सर गजल ढेरों दाद कबूल फरमाएं!!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 23, 2015 at 12:52am

ग़ज़ल अब भी मुकम्मल कह न पाया
अगरचे ज़ेहन ने सोचा बहुत है.....शानदार आदरणीय दिनेश जी , बधाई आपको ! सादर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 21, 2015 at 10:10pm
गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा
बहाना जो भी हो थोथा बहुत है

वाह दिनेश ही वाह आप तो कमाल करते है ........ वाह
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:51pm
सराहना के लिए बहुत शुक्रिया भाई Nirmal Nadeem जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:50pm
सराहना के लिए बहुत शुक्रिया आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:49pm
सराहना के लिए बहुत शुक्रिया भाई उमेश जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:48pm
सराहना के लिए बहुत शुक्रिया भाई मिथिलेश वामनकर जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:46pm
बहुत शुक्रिया मोहतरमा pratibha tripathi जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:45pm
बहुत शुक्रिया भाई maharshi tripathi जी। हार्दिक आभार।
Comment by दिनेश कुमार on March 21, 2015 at 6:44pm
बहुत शुक्रिया आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर जी।

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