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ग़ज़ल-नूर-ख़ुदा का ख़ौफ़ करो

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२ (सभी संभव कॉम्बिनेशन्स)

हमें न ऐसे सताओ ख़ुदा
का ख़ौफ़ करो
ज़रा क़रीब तो आओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो.
.
अभी तो हाथ में आया है मलमली दामन 
अभी न छोड़ के जाओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो. 
.
न जाने कितने जनम की है तिश्नगी, आकर 
लबों का जाम पिलाओ, ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो.
.
करेगा बातें ज़माने में जाने वो क्या क्या
अदू से दिल न लगाओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो.
.

जनाब आपके ज़ुल्मो की दास्ताँ है तवील  
करम न अपने गिनाओ ख़ुदा का
ख़ौफ़ करो.
.
हुज़ूर हो के ख़फ़ा आप हम से बैठे हैं,
हमीं से मान भी जाओ, ख़ुदा का ख़ौफ़ करो.
.
कभी हमें भी मिले हक़ यूँ रूठ जाने का
कभी हमें भी मनाओ ख़ुदा का ख़ौफ़ करो.
.
ये रात फैल गयी है हमारे अंदर भी
चराग़-ए-इल्म जलाओ ख़ुदा का ख़ौफ़ करो.
.
न जाने आप ग़ज़ल किस की गुनगुनाते हैं
ग़ज़ल हमारी भी गाओ ख़ुदा का ख़ौफ़ करो.
.
नूर 
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 973

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 20, 2015 at 7:24pm

शुक्रिया सुधीर जी 

Comment by Sudhir Dwivedi on April 20, 2015 at 7:22pm

नीलेश जी 

बहुत खूबसूरत गजल से रूबरू कराने का शुक्रिया !!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2015 at 10:30am

शुक्रिया डॉ आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2015 at 10:30am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2015 at 10:30am

शुक्रिया भाई उमेश जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2015 at 10:29am

शुक्रिया आ. मिथिलेश जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 4, 2015 at 1:37pm

आदरणीय नूर जी , ग़ज़लों की श्रंखला में एक और बेहतरीन ग़ज़ल ..मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 4, 2015 at 12:23pm

आदरणीय नीलेश भाई , एक और अच्छी गज़ल के लिये दिली मुबारक बाद कुबूल करें ॥

Comment by umesh katara on April 4, 2015 at 8:16am

न जाने कितने जनम की है तिश्नगी, आकर  
लबों का जाम पिलाओ, ख़ुदा का
 ख़ौफ़ करो. वाह वाह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 3, 2015 at 9:03pm

आदरणीय नीलेश जी बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है. रदीफ़ को जिस खूबसूरती से निभाया है, मुग्ध हूँ देखकर. दिल से दाद कुबूल फरमाएं. 

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