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Nilesh Shevgaonkar's Blog (189)

ग़ज़ल नूर की - सुनाने जैसी कोई दास्ताँ नहीं हूँ मैं

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सुनाने जैसी कोई दास्ताँ नहीं हूँ मैं 

जहाँ मक़ाम है मेरा वहाँ नहीं हूँ मैं.

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ये और बात कि कल जैसी मुझ में बात नहीं    

अगरचे आज भी सौदा गराँ नहीं हूँ मैं.

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ख़ला की गूँज में मैं डूबता उभरता हूँ   

ख़मोशियों से बना हूँ ज़बां नहीं हूँ मैं.

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मु’आशरे के सिखाए हुए हैं सब आदाब  

किसी का अक्स हूँ ख़ुद का बयाँ नहीं हूँ मैं.

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सवाली पूछ रहा था कहाँ कहाँ है तू

जवाब आया उधर से कहाँ नहीं हूँ मैं?

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परे हूँ जिस्म से अपने…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 11, 2025 at 1:08pm — 23 Comments

ग़ज़ल नूर की - मुक़ाबिल ज़ुल्म के लश्कर खड़े हैं

मुक़ाबिल ज़ुल्म के लश्कर खड़े हैं

मगर पाण्डव हैं मुट्ठी भर, खड़े हैं.

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हम इतनी बार जो गिर कर खड़े हैं

मुख़ालिफ़ हार कर शश्दर खड़े हैं.      शश्दर-आश्चर्यचकित, स्तब्ध

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कभी कोई बसेगा दिल-मकां में

हम इस उम्मीद में जर्जर खड़े हैं.

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ऐ रावण! अब तेरा बचना है मुश्किल

तेरे द्वारे पे कुछ बंदर खड़े हैं.

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उसे लगता है हम को मार देगा

हम अपने जिस्म से बाहर खड़े हैं.

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मुझे क़तरा समझ बैठा है नादाँ

मेरे पीछे…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 29, 2025 at 6:45pm — 13 Comments

ग़ज़ल नूर की - ज़िन्दगी की रह-गुज़र दुश्वार भी करते रहे

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ज़िन्दगी की रह-गुज़र दुश्वार भी करते रहे

दुश्मनी हम से हमारे यार भी करते रहे.

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जादू टोना यूँ लब ओ रुख़्सार भी करते रहे

जो मुदावा थे वही बीमार भी करते रहे.

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उस की सुहबत के असर में हो गए उस की तरह  

फिर उसी के लहजे में गुफ़्तार भी करते रहे.

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जिस्म को जीते रहे हम एक क़िस्सा मान कर  

और अपनी रूह को तैय्यार भी करते रहे.

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हर क़िले के द्वार अन्दर ही से खोले जाते हैं

दुश्मनों का काम चौकीदार भी करते रहे.

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‘नूर’ ऐसा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 25, 2025 at 6:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल नूर की - ताने बाने में उलझा है जल्दी पगला जाएगा

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ताने बाने में उलझा है जल्दी पगला जाएगा,

मुझ को बुनने वाला बुनकर ख़ुद ही पगला जाएगा.

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इश्क़ के रस्ते पर चलना है तेरी मर्ज़ी; लेकिन सुन

इस रस्ते को श्राप मिला है राही पगला जाएगा.

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उस के हुनर पर किस को शक़ है लेकिन उस की सोचो तो

ज़ख़्म हमारे सीते सीते दर्ज़ी पगला जाएगा.  

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उस को समुन्दर जैसी छोटी मोटी जगहें भाती हैं

इन आँखों में आएगा तो पानी पगला जाएगा.

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जिससे बदला लूँगा उस को इतना याद करूँगा मैं

मेरे नाम की लेते लेते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 15, 2025 at 2:59pm — 17 Comments

ग़ज़ल नूर की - आँखों की बीनाई जैसा

आँखों की बीनाई जैसा

वो चेहरा पुरवाई जैसा.

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तेरा होना क्यूँ लगता है

गर्मी में अमराई जैसा.

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तेरे प्यार में तर होने दे

मुझ को माह-ए-जुलाई जैसा.

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जोबन आया है, फिसलोगे

ये रस्ता है काई जैसा.

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साथ हैं हम बस कहने भर को

दूध हूँ मैं वो मलाई जैसा.  

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जाते जाते उस का बोसा

जुर्म के बाद सफ़ाई जैसा.

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ज़ह’न है मानों शह्र का एसपी  

और ये दिल बलवाई जैसा.

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तेरा आना पल दो पल को

सरकारी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2025 at 4:22pm — 19 Comments

ग़ज़ल नूर की - गुनाह कर के भी उतरा नहीं ख़ुमार मेरा

1212 1122 1212 112/22

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गुनाह कर के भी उतरा नहीं ख़ुमार मेरा

नशा उतार ख़ुदाया नशा उतार मेरा.

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बना हुआ हूँ मैं जैसा मैं वैसा हूँ ही नहीं   

मुझे मुझी सा बना दे गुरूर मार मेरा.

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ये हिचकियाँ जो मुझे बार बार लगती हैं

पुकारता है कोई नाम बार बार मेरा.  

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मेरी हयात का रस्ता कटा है उजलत में

मुझे भरम था फ़लक को है इंतज़ार मेरा.

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पड़े जो बेंत मुझे उस की, दौड़ पड़ता हूँ

मैं जैसे हूँ कोई घोड़ा ये मन सवार मेरा.

.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2025 at 3:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की - तो फिर जन्नतों की कहाँ जुस्तजू हो

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तो फिर जन्नतों की कहाँ जुस्तजू हो

जो मुझ में नुमायाँ फ़क़त तू ही तू हो.

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ये रौशन ज़मीरी अमल एक माँगे

नदामत के अश्कों से दिल का वुज़ू हो.

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जो तख़लीक़ सब की सभी से जुदा है

भला राह मुक्ति की क्यूँ  हू-ब-हू हो.

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कभी हो ख़यालात से ज़ह’न ख़ाली

ख़लाओं से भी तो कभी गुफ़्तगू हो.

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वो मुल्हिद नहीं हो मगर ये है मुमकिन

उसे बस सवालात करने की ख़ू हो.

(मुल्हिद--नास्तिक) (ख़ू -आदत)

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निलेश "नूर"

मौलिक/…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 18, 2024 at 4:51pm — 5 Comments

ग़ज़ल नूर की -कुछ थे अधूरे काम सो आना पड़ा हमें.

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कुछ थे अधूरे काम सो आना पड़ा हमें.

फ़ानी बदन में ख़ुद को समाना पड़ा हमें

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जश्न-ए-जहान था ही नहीं अपने वास्ते

आ ही गए तो जश्न मनाना पड़ा हमें.

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फिर जब पहेली मौत…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 11, 2024 at 11:53am — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - दफ़्तर में तू पहला दिख

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दफ़्तर में तू पहला दिख

काम न कर पर करता दिख.

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ये बाज़ार का मंतर है

सस्ता बिक पर महँगा दिख.

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कर व्यवहार परायों सा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on July 31, 2023 at 11:05am — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - नशे में लाख रहूँ पर बहक नहीं सकता

१२१२ ११२२ १२१२ २२ (११२)

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नशे में लाख रहूँ पर बहक नहीं सकता

लबों से तल्ख़ियाँ दिल की मैं बक नहीं सकता.

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मुझे ये डर है बयाबान में न खो जाऊं

मैं अपने आप में ज़्यादा भटक नहीं सकता.

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कभी लगे है…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on July 19, 2023 at 3:22pm — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की- चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम

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221 2121 1221 212 



चाहें किसी को और निबाहें किसी से हम

ख़ुश होईये कि हो ही गए आदमी से हम.

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वो आते इस से क़ब्ल दवा काम कर गई

उकता गए हकीम की चारागरी से हम.

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दीवार पर लगी हुई तस्वीर है अना

पीछे से झाँकती हुई इक छिपकली से हम.  

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बन्दों में और ख़ुदा में अजब घालमेल है

हम से ही वो बना है, बने हैं उसी से हम.

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सूरज नहीं हैं हम जो किसी रात से डरें

लड़ते रहेंगे सुब्ह तलक तीरगी से हम.

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दुनिया की दौड़…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2023 at 5:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - अँधेरे पल में ख़ुद के ‘नूर’ का दीदार हो जाना

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अँधेरे पल में ख़ुद के ‘नूर’ का दीदार हो जाना

ये ऐसा है कि दुनियावी बदन के पार हो जाना.

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कई सदियों से बस किरदार बन कर थक चुका हूँ मैं

मेरी है मुख़्तसर ख़्वाहिश कहानी-कार हो जाना.

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दुआ है, जान है जब तक मेरा ये जिस्म चल जाए

बहुत रंजीदा करता है यूँ ही बेकार हो जाना.  

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जिन्हें मैं जोड़ने में रोज़ थोड़ा टूट जाता था

उन्हें भी रास आया है मेरा मिस्मार हो जाना.     (तक़ाबुले रदीफ़ स्वीकर करते हुए)

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मेरी बातें वही…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 19, 2023 at 5:15pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - बनें जब तक बना कर हम रखेंगे इस ज़माने से

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बनें जब तक बना कर हम रखेंगे इस ज़माने से

फिर इक दिन लौट जाएँगे चले थे जिस ठिकाने से.  

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अँधेरे की हुकूमत यूँ तो चारों सिम्त फैली है

मगर वो काँप जाता है दीये के टिमटिमाने से.

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तो फिर दरिया तो क्या मैं इक समुन्दर भी बहा देता

अगर बिछड़ा कोई मिलता हो अश्कों के बहाने से.

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कई बरसों से मैं बस उन की ही महफ़िल में जाता हूँ

जिन्हें कुछ फ़र्क़ पड़ता हो मेरे आने न आने से.

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बड़प्पन ये कि औरों से लकीर अपनी बड़ी रक्खें

नहीं बढ़ता किसी…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on June 14, 2023 at 1:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल नूर की



बारहा साहिल की जानिब लह’र क्यूँ आती रही


सर पटकती पाँव पड़ती रोती चिल्लाती रही.

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ओस में भीगे हुए इक गुल को नज़ला हो गया

देर तक तितली लिपटकर उस को गर्माती रही.

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इक नदी की चाह में रोया समुन्दर ज़ार…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2023 at 1:08pm — 4 Comments

ग़ज़ल 'नूर' की - कोई हुस्न-परस्त जो अपने रब की बातें करता है

कोई हुस्न-परस्त जो अपने रब की बातें करता है

तिल की बातें करता है या लब की बातें करता है.

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दिल तो फिर भी धड़कन धड़कन सब की बातें करता है

ज़ह’न है साहूकार फ़क़त मतलब की बातें करता है.

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लड़ते लड़ते दुश्मन से भी हो जाता है इश्क़ अजब

जुगनू भी अक्सर दीये से शब् की बातें करता है.

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इक मुद्दत से यार! चलन से बाहर है ये लफ़्ज़-ए-वफ़ा  

दिल नादान मुअर्रिख़ जैसा; कब की बातें करता है.                         मुअर्रिख़- इतिहास-कार…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2023 at 4:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की- नहीं जो था होना वो सब हो रहा है

नहीं जो था होना वो सब हो रहा है

निज़ाम-ए-ख़ुदा में ग़ज़ब हो रहा है.

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इबादत में कैसा शग़ब हो रहा है                  शग़ब- कोलाहल 

धड़क-कर ये दिल बे-अदब हो रहा है.

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ज़रूरी नहीं कोई मक़सद हो अपना…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 2, 2023 at 5:44pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की- दर्द है तो कभी दवा है ये



दर्द है तो कभी दवा है ये,

इश्क़ है या कि मोजज़ा है ये.

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जो बिख़रने का सिलसिला है ये

ख़ुशबू होने ही की सज़ा है ये.

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हम जो रोते हैं कुफ़्र होता है

मज़हब-ए-इश्क़ में मना है ये.

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अपनी ताक़त को वो समझता है  

हुस्न के साथ मसअला है ये.

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ख़त भला तेरा मैं जलाऊँगा?

आँसुओं से भभक गया  है ये.

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हम तो फिरऔन इसको कहते हैं

ये समझता रहे ख़ुदा है ये. 

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ग़म यहीं है यहीं कहीं होगा

तेरे देखे से छुप…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 29, 2022 at 11:30am — 17 Comments

ग़ज़ल नूर की- ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए

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ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए

किस किस को हम पीर बना कर बैठ गए.

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यादें हम से छीन के कोई दिखलाओ

लो हम तो  जागीर बना कर बैठ गए.  

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दुनिया की तस्वीर बनानी थी हम को

हम तेरी तस्वीर बना कर बैठ गए.  

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मौक़ा रख कर भेजा था नाकामी में

आप जिसे तक़दीर बना कर बैठ गए.

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मैंने कॉपी में इक चिड़िया क्या मांडी

दुनिया वाले तीर बना कर बैठ गए.

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चलती फिरती मूरत देख के हम नादाँ

मंदिर की तामीर बना कर बैठ गए.

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हँसते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 23, 2022 at 9:02am — 2 Comments

ग़ज़ल नूर की- कहीं ये उन के मुख़ालिफ़ की कोई चाल न हो

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कहीं ये उन के मुख़ालिफ़ की कोई चाल न हो

सो चाहते हैं कि उन से कोई सवाल न हो.

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कोई फ़िराक़ न हो और कोई विसाल न हो

उठे वो मौज कि अपना हमें ख़याल न हो.   

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तेरी तलब में हमें वो मक़ाम पाना है

कि लुट भी जाएँ तो लुट जाने का मलाल न हो.

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हमें सफ़र जो ये बख़्शा है क्या बने इसका

न हो उरूज अगर इस में या ज़वाल न हो.

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बशर न हो तो ख़ुदा भी न हो जहाँ में कोई 

न हो जहाँ में ख़ुदा तो कोई वबाल न हो.

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मैं चाहता हूँ ये दुनिया वहाँ…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on January 12, 2022 at 9:00am — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - उस के नाम पे धोखे खाते रहते हो

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उस के नाम पे धोके खाते रहते हो

फिर भी उस के ही गुण गाते रहते हो.

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उस के आगे बोल नहीं पाते हो तुम

मैं बोलूँ तो हाथ दबाते रहते हो.

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कोई नया इस दुनिआ में कब आता है

तुम ही जा कर वापस आते रहते हो.

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तुम को वापस अपने घर भी जाना है

क्यूँ दुनिआ से लाग  लगाते रहते हो.

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अक्सर मिलता है वो इन्साँ पूजता है 

वो जिस को तुम ख़ुदा बताते रहते हो.

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वाइज़ जी क्या तुम ने वो सब सीख लिया 

हम को जो कुछ तुम समझाते रहते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 27, 2021 at 8:30am — 9 Comments

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