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ग़ज़ल नूर की - अँधेरे पल में ख़ुद के ‘नूर’ का दीदार हो जाना

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अँधेरे पल में ख़ुद के ‘नूर’ का दीदार हो जाना
ये ऐसा है कि दुनियावी बदन के पार हो जाना.
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कई सदियों से बस किरदार बन कर थक चुका हूँ मैं
मेरी है मुख़्तसर ख़्वाहिश कहानी-कार हो जाना.
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दुआ है, जान है जब तक मेरा ये जिस्म चल जाए
बहुत रंजीदा करता है यूँ ही बेकार हो जाना.  
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जिन्हें मैं जोड़ने में रोज़ थोड़ा टूट जाता था
उन्हें भी रास आया है मेरा मिस्मार हो जाना.     (तक़ाबुले रदीफ़ स्वीकर करते हुए)
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मेरी बातें वही समझेंगे जिन के बेटियाँ भी हैं
हिफ़ाज़त गुल की करनी हो तो ख़ुद ही ख़ार हो जाना.
.
मेरा चेहरा मेरी आँखें बयाँ मुझ को नहीं करते
सिखाया ही नहीं मैंने इन्हें अख़बार हो जाना.
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निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 316

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2023 at 11:18am

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 27, 2023 at 6:33pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हर शेर बेहतरीन हैं । हार्दिक बधाई।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 26, 2023 at 12:23pm

धन्यवाद आ. श्याम नारायण वर्मा साहब 

Comment by Shyam Narain Verma on June 25, 2023 at 8:04pm
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 20, 2023 at 12:52pm

शुक्रिया आ. गुरप्रीत सिंह जी 

Comment by Gurpreet Singh jammu on June 19, 2023 at 9:15pm

कई सदियों से बस किरदार बन कर थक चुका हूँ मैं
मेरी है मुख़्तसर ख़्वाहिश कहानी-कार हो जाना.


मेरी बातें वही समझेंगे जिन के बेटियाँ भी हैं
हिफ़ाज़त गुल की करनी हो तो ख़ुद ही ख़ार हो जाना.

मेरा चेहरा मेरी आँखें बयाँ मुझ को नहीं करते
सिखाया ही नहीं मैंने इन्हें अख़बार हो जाना.

वाह सर जी वाह क्या खुबसूरत अशआर कहे हैं आपने। बहुत बढ़िया ग़ज़ल।

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