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ग़ज़ल-नूर-यादों को हम याद आएं हैं,

मात्रिक बहर 
२२/२२/२२/२२/
.
अपना ग़म ख़ुद ही से छुपा कर,
जब निकलो,, मुस्कान सजा कर.
.
ग़ैरों से इतना न खुला कर,
दिल नौचेंगे ...मौका पा कर. 
.
नया तज़्रबा है हर धोका,  
जश्न मनाओ बोतल ला कर.
.
तुम समझे लोबान जला है,
मैं रक्साँ था ज़ख्म जला कर.
.
मैंने ख़ुद को तर्क किया है,
तेरी मर्ज़ी हाँ कर...ना कर.
.
शायद कोई राह छुपी हो,
देख ज़रा दीवार ढहा कर.
.
यादों को हम याद आएं हैं,
लौट आयी हैं वापस, जा कर.   
.
घुटते-घुटते मर जायेगा,
अश्क अपनी आँखों से रिहा कर. 
.
जन्नत वन्नत खेल तमाशे,
देख चुका!! अल्लाह भला कर!!
.
मौलिक / अप्रकाशित 
निलेश "नूर"

Views: 754

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 23, 2016 at 9:38pm

शुक्रिया आ. डॉ साहब 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 23, 2016 at 3:51pm

आदरणीय नीलेश जी

शायद कोई राह छुपी हो,
देख ज़रा दीवार ढहा कर. ..

अपना ग़म ख़ुद ही से छुपा कर, 
जब निकलो,, मुस्कान सजा कर.
.
ग़ैरों से इतना न खुला कर,
दिल नौचेंगे ...मौका पा कर......पूरी ग़ज़ल ही जानदार है पर ये शेर मुझे बेहद पसंद आये इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ ..मेरी हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 21, 2016 at 9:20pm

शुक्रिया आ. गिरिराज जी ...
नया तज़रबा है हर धोका में हर  धोका एक नया अनुभव है ..ऐसा मंतव्य है ..हर धोका खा कर अनुभव मिलता है इसलिए जश्न मनाने की बात है ..आप के सुझाए ...धोखा है , हर नया तज़्रबा बेचारा हर नया तज़रबा ही धोका हो रहा है ....
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 21, 2016 at 9:17pm

शुक्रिआ आ. राजेश दीदी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 21, 2016 at 9:17pm

शुक्रिया आ. कल्याण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 21, 2016 at 9:17pm

शु. आ वर्मा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 21, 2016 at 5:44pm

आदरणीय नीलेश भाई , बहुत खूबसूरत गज़ल कही है , सभी अशआर बढ़िया हुये हैं , दिल से बधाइयाँ आपको ।

नया तज़्रबा है हर धोका,    इस मिसरे को ऐसा कहें तो बात और खुल कर आयेगी ऐसा मुझे लगता है --

धोखा है , हर नया तज़्रबा  -- सोच लीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 21, 2016 at 4:38pm

शायद कोई राह छुपी हो,
देख ज़रा दीवार ढहा कर.
.
यादों को हम याद आएं हैं,
लौट आयी हैं वापस, जा कर.   
. वाह वाह हर शेर शानदार 

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आ० नीलेश भैया दिल से दाद लीजिये 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 21, 2016 at 4:17pm
अति उत्तम रचना बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on June 21, 2016 at 10:58am
बहुत सुन्दर रचना के लिये आपको बधाई

कृपया ध्यान दे...

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