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ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल-नूर

२१२२/२१२२/२१२१२ 
.

ज़िन्दगी क़दमों पे थी तब शूल थे गड़े,
जब चले कांधो पे, पीछे... फूल थे पड़े.
.
काम तो छोटे ही आये.. वक़्त जब पडा,
लिस्ट में कितने अगरचे नाम थे बड़े. 
.
एक है अल्लाह ये कह कर गये रसूल,
हमने उस के नाम पर भी कर लिए धड़े.

झाड़ियाँ जो झुक गयी, तूफ़ान सह गयीं,
जड़ से थे उखड़े पड़े जो, तन के थे खड़े.
.
ज़िन्दगी के बाद कासा, ताज बन गया,
कुछ नगीने जिस में थे ईमान के जड़े.
.
हैं बड़ा तेरा ख़ुदा या रब मेरा बड़ा,
“नूर” इस बचकानेपन से कौन अब लडे?
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

Views: 1074

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2016 at 7:56pm

शुक्रिया आ. श्री सुनील जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2016 at 7:56pm

शुक्रिया आ. कल्पना जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2016 at 7:56pm

शुक्रिया आ. सौरभ जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2016 at 7:55pm

शुक्रिया आ. कांता  जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2016 at 7:55pm

शुक्रिया आ. अनुज जी 

Comment by shree suneel on June 2, 2016 at 10:03pm
काम तो छोटे ही आये.. वक़्त जब पडा,
लिस्ट में कितने अगरचे नाम थे बड़े. .. सच्ची बात!
गंभीर मतला औ अन्य उम्दा अशआर के लिए बधाई आपको आदरणीय निलेश जी. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 2, 2016 at 3:49pm

जय जय !

सूफ़ियाना मतला के लिए विशेष बधाई आदरणीय नीलेश नूर जी

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 3:45pm

झाड़ियाँ जो झुक गयी, तूफ़ान सह गयीं,
जड़ से थे उखड़े पड़े जो, तन के थे खड़े.
.
ज़िन्दगी के बाद कासा, ताज बन गया,
कुछ नगीने जिस में थे ईमान के जड़े. बहुत खूब |

Comment by kanta roy on June 2, 2016 at 11:11am
झाड़ियाँ जो झुक गयी, तूफ़ान सह गयीं,
जड़ से थे उखड़े पड़े जो, तन के थे खड़े. ----- हमेशा की तरह लाजवाब है यह । बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय निलेश जी ।
Comment by Anuj on June 1, 2016 at 9:45pm

एक है अल्लाह ये कह कर गये रसूल, 
हमने उस के नाम पर भी कर लिए धड़े.

आदरणीय निलेश जी सच्चाई बयान करते ऐसे शेरों के लिए बधाईयाँ.

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